Friday, December 29, 2023

मेरा गांव बदल रहा है, देखो आगे बढ़ रहा है ?

काफी लंबे वक्त के बाद एक बड़े समय अवधि को गांव में बिताने का मौका मिला, तो इच्छा जगी की गांव को देखूं और देखा भी। लेकिन गांव वह नहीं दिखा जो देखने की चाहत थी। पहले वाला गांव मानों आज वाले गांव के सामने किताबों के पन्नों में सिमट गया था या अतित की याद बन गया था। हमने 90 के दशक के गांव को जिया था और किताबों में कथा सम्राट मुंशी जी (मुशी प्रेमचंद) की कहानी पढ़कर बड़ा हुआ हूं, जिनकी कहानी में हलकू, केदार या सुजान का नाम सुनते हीं गांवों की व्याख्या हो जाती थी उस वक्त गांवों की हकीकत ऐसी थी की ग्रामीण जीवन भारतीय समाज का दर्पण माना जाता था। लेकिन आज गांव शहर से ज्यादा तेजी से बदल रहा है कारण है लोगों में आधुनिक बनने की धुन सवार होना जिसका नतीजा है कि अब गांव, गांव नहीं बल्कि बाजारों और शहर की बराबरी करने लगे हैं और शहर मानों वीरान।
आज शुक्रवार है... मुझे याद है हमारे गांव से बाजार/कसबे की दूरी महज एक कोस यानी 3 किलो मीटर है और पहले बाजार में सप्ताह में दो निर्धारित दिनों पर बाजार गठीत होता था जहां गांव के किसान अपने सब्जियों और फलों की बिक्री करने पहुंचते थे और गांव से लोग खरीदारी भी करने आते थे। इतना ही नहीं गांव के लोग कई और कामों के लिए भी बाजार लगने के दिन का इंतजार करते थे। लेकिन आज बाजार मानों गांवों तक पहुंच गया है। आज मेरे गांव के बाहर एक छोटा बाजार लगने लगा हैं जिसे गांव के लोगों ने एक नाम दे दिया है और ये सिर्फ मेरे गांव के ही साथ नहीं बल्कि 28 राज्यों और 9 केंद्र शासित प्रदेशो वाले देश के 6,28,221 गांवों के साथ है। ऐसा नहीं है कि शहरीकरण का ये दौर अचानक बढ़ा है। 1991 में 25.71 फीसदी लोग शहरों में थे। उससे 10 साल पहले यानी 1981 में ये आंकड़ा 23.34 फीसदी था। हलांकि 2001 के जनगणना आंकड़े के अनुसार 27.81 फीसदी और 2011 के आंकड़ों के अनुसार 31.16 प्रतिशत लोग शहरों में बसने लगे हैं। हालांकि साल 2020-21 में आई महामारी कोरोना के बाद एक बड़ा बदलाव देखा गया। इस दौरान लोग शहर से गांव की तरफ तो भागे लेकिन गांव देखते ही देखते शहर बनने लगा और आज शहर मानों गांव।
अब सवाल ये है कि गांव कैसे शहर बनने लगा ? इस सवाल के जबाव के लिए पहले हमे समझना होगा की शहर का मतलब क्या है? 'शहर' असल में ऊर्दू शब्द है जिसका अर्थ होता है नगर या सिटी। "शहर" का मतलब तो आप बेहतर जानते ही होंगे, यानी नगर - जहां ग्रामीण क्षेत्रों के विपरीत आधुनिकता और औद्योगिक परवेश का बोलबाला है । सड़क, बिजली, पानी, बड़े बाजार, माल, यातायात के आधुनिक साधन इत्यादि से लबरेज़ जगह जिसे हम आमतौर पर शहर कहते हैं। अब वह सारे साधन-संसाधन गांवों में आसानी से मौजूद है। गांव में अब गली-गली तक सड़कें बन गई हैं और बड़ी गाड़ियों के साथ ही टोटो-ऑटो रिक्सा की मौजूदगी ने यातायात को आसान बना दिया है, अब गांव को अंधेरे से बचाने के लिए टिमटिमाता दीया-बाती या लालटेन की रौशनी नहीं बल्कि 24 घंटे बिजली की सुविधा है, ओ छोड़िए न लोगों के घरों में खोजने पर चुल्लू भर मिट्टी का तेल (किरासन तेल) भी नहीं मिलेगा क्योंकि पहले गांव में तेल डिलर (सरकारी विक्रेता) के यहां मिलता था लेकिन अब वह सुविधा भी सरकार ने बंद कर दिया है। गांव भी अब अधुनिक सुविधाओं से लैस हो गए हैं जिसका नतीजा है कि अब ऑनलाइन खऱीदारी में गांव में बढ़ गया है। और तो और शहरों में रेडी लगाने वाले अब गांव की तरफ कूच कर गए हैं जिसके कारण गांव में महिलाएं भी खूब खरीदारी कर रही है और लोगों के लिए रोजगार का साधन भी बढ़ गया है और गांव शहर बन गया है।
हालांकि गावों के बदलाव को देखकर मन चकित तो नहीं है लेकिन इतनी तेजी से हुए बदलाव को हमारे गावई सामाजिक परिवेश ने ऐसे स्वीकार कर लिया है कि क्या ही बताएं। अब गांव में शांति नहीं हैं, जहां गांव में पहले पड़ोसियों के झगड़े सुनाई देते थे और गांव की बहुएं घर की रोसनदान (घरों की दीवारों में कुछ जगह हवा के लिए छोड़ा जाता है) खिड़की या छत की बालकनी से झगड़े को सुना करती और घंटों चर्चा करती थी आज वह सब खत्म है। आज गांवों में भी DJ की रापचीक वाली धुन सुनाई देती और पड़ोसी शहरों वाले पड़ोसी की तरह अनजान हो गए हैं। जो कुछ जानकार बचे भी हैं उन्हें मोबाइल एडिक्शन ने अपने जाल में फांस लिया है। उसकी सबसे ज्यादा शिकार आज की नई पीढ़ी है। वह पीढ़ी जिस पर अधुनिकता के दौर ने इस तरह असर किया है कि वह वाट्सएप यूनिवर्सिटी की ज्ञान से खुद को विद्वान और अपने से बड़ों को अज्ञानता की मूरत समझते हैं जिनके पास ना ही संस्कारों की सांस बची है ना ही भविष्य में होने की आस... अब ऐसे गांव में रहने के लिए लोगों के पास क्या बचा है यह रहने वाले और देखने वाले ही तय करते हैं या कर रहे हैं... अब तो गांव में रहने वाले शहर जाने की ना उम्मीद कर रहे है ना वहां होने पाली परेशानियों को कोश रहे हैं। फिर बचा क्या है दोनों में अंतर ये आप ही बताएं...

Friday, July 28, 2023

"जन्मदिन" पहले और अब

वो बचपन कितना प्यारा था... अपनों से भरा घर हमारा था जन्मदिन आते ही... मानो उत्सव की तैयारी करते थे उस वक्त केक का नहीं सहारा था हलवा से भरी थाली सजाते थे केक कट रहा है... ये घूम- घूम के सबको बताते थे मां होती थी, दादा जी, दादी का भी सहारा था चाचा की पॉकेट से निकलती टॉफी चाची की पेंसिल-कटर प्यारा था फिर अगले दिन... बहनों की गिफ्ट पर दावेदारी फिर जमकर होती मारामारी लेकिन आज... आज मैं तो बड़ा होगा गया अपने पैरो पर खड़ा हो गया अब ना जन्मदिन की आस रहती है ना बचपन वाली वो प्यास रहती है कुछ बधाइयाँ मिल ही जाती है कुछ व्यस्तता तैयारियों को खा जाती है अब तो अपनो के पास भी वक्त न रहा एक कॉल कर ले ये नियम सख्त ना रहा अब तो हम सोशल मीडिया में सिमट रहे हैं... भावनाएं तो सिर्फ स्टेट्स में लिपट रहे हैं वक्त भी कुछ ऐसा ही आया है ऐसे ही चलना है ये बताया है सब ने माना है... बढ़ रहे हैं दायरे, इंसान सिमट रहा है सोशल मीडिया पर बस प्यार पनप रहा है जिसको जानते नहीं वो अपना बना है जो अपने है वो 100 कोस पर खड़ा है अब तो ना BDAY, ना Aniversy, ना उत्सव अच्छा लगता है बस स्टेट्स लगाना है,क्योंकि दुनिया में यहीं सच्चा लगता।

Tuesday, May 2, 2023

62% लोग नहीं सुनते हैं "मन की बात", सरकार ने छुपाया सच !

देश-विदेश में बहुचर्चित भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्व प्रसिद्ध (ये मैं नहीं कह रहा) रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" के 100 एपिसोड पूरे होने पर BJP ने पूरा तामझाम (प्रचार) किया। 100वें एपिसोड को सुनने के लिए दिल्ली में जाने माने 100 हस्तियों को बुलाया। मंदिर नहीं, मदरसों में तालीम लेने वाले बच्चे "मन की बात" कार्यक्रम सुनते
नजर आएं। BJP के परिश्रमी सांसदों ने अपने अपने चुनाव क्षेत्रों में कार्यक्रम सुनने के लिए विशेष व्यवस्था कराई। कई चैनलों के 20-40 मिनट तक के स्लॉट भी खरीदे गए होंगे (कोई प्रमाण नहीं है।) क्योंकि कार्यक्रम को सफल बनाना था।

अखबारों और मीडिया में शानदार पंच लाइन के साथ कार्यक्रम की सफलता का श्रेय कुछ ने पीएम मोदी और पीएम ने देशवासियों को दिया। कार्यक्रम के बाद ये  सिर्फ़ प्रोग्राम ही नहीं आस्था का पर्व बन गया। बची खुची कसर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एक सर्वे ने पूरी कर दी।

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने सर्वे में दावा किया की IIMC (Indian Institute of  mass Communication) की रिपोर्ट में "मन की बात" कार्यक्रम बेजोड़ है। सचाई देखिए: सर्वे में 76% लोगों में 63 फीसदी ने कहा की वह Youtube पर इस कार्यक्रम को पसंद करते हैं।

IIMC का Report 

40 फीसदी ने इसे पाठशाला के तौर पर देखा  जहां गुमनाम समाज और शिल्पियों से श्रोता रूबरू हुए। IIMC का सर्वे आप Google में सर्च कर के देख लीजिए हर अखबारों की हेडलाइन में मिल जायेगा।

अब इस सर्वे से पहले का एक सच सुनिए। दरअसल जब 'मन की बात'  कार्यक्रम के 100वें एपिसोड को ऐतिहासिक बनाने के लिए BJP नेता तैयारी कर रहे थे, PM MODI फ़िल्म शूट करा रहे थे तब सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) ने  'मीडिया इन इंडिया: एक्सेस, प्रैक्टिसेज, कंसर्न्स एंड इफेक्ट्स' शीर्षक से एक अध्ययन प्रकाशित किया।


CSDS ने अपने शोध में दावा किया की प्रधानमंत्री मोदी के "मन की बात" कार्यक्रम को 62% लोग ने कभी नहीं सुना मतलब आधे से अधिक आबादी इस रेडियो कार्यक्रम से दूर है। वहीं मात्र 5% आबादी इसे हमेशा सुनती है, 5% ने कुछ महीने और 5% कभी कभार सुन लेते हैं। इतना ही नहीं 7% ने कुछ महीने सुनकर छोड़ा जबकि 21% ने एक-दो बार सुना है। मतलब कुल मिला भी देखें तो 48% आबादी जो की नहीं सुनने वालों की संख्या से कम है। अब इस रिपोर्ट को अगर सांसद, मंत्री, विधायक या कोई मोदी भक्त खारिज भी करें तो एक और गौर करनेवाली बात पर ध्यान दें।

साल 1936 में 'इंपोरियल रेडियो ऑफ इंडिया' (जो बाद में ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बना) की शुरुआत के बाद से बीच के कुछ दशक को छोड़ दें तो पहले टीवी और अब मोबाइल के आने के बाद आज रेडियो की स्थिति से आप भी अनजान नहीं होंगे।

खैर आपको आंकड़ा बताते हैं। साल 2022 में विश्व रेडियो दिवस (13 फरवरी) के मौके पर छपे दैनिक जागरण, झारखंड के एक लेख के मुताबिक रेडियो खांची के फाउंडर डायरेक्टर डॉ. आनंद कुमार ठाकुर बताते हैं कि उनके रेडियो (जो युनेस्को में चयनित है) को 7-10 फीसदी श्रोता सुन लेते हैं। ऐसे में अनुमान आप लगाएं तो AIR को सुनने वालों की संख्या भी कुछ वैसे ही होगी। चलिए इसे बढ़ा कर हम 20% भी कर लें तो सिर्फ 1 कार्यक्रम के लिए लोगों के प्यार को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। क्योंकि जहां वेब सिरीज और युवाओं के लिए रापचिक/डिस्को/डीजे गानों की धुन पर धूम धड़क करने की आदत है वह PM के ज्ञानवर्धन को मुझे नहीं लगता की सुनता होगा। जो कुछ बचे होंगे उन्हें gaana, Jio Music, Youtube जैसे स्थानों से फुरसत नहीं होगी। कुछेक प्रतिभावान होंगे उन्हें छोड़ दें फिर भी।

खैर PM हैं और योग्यता का भंडार है तो उनके कार्यक्रम के लिए इतना प्यार स्वीकारा जा सकता है।

लेकिन सवाल उस रिपोर्ट (CSDS) का है जिसे आम जनता तक आने से पहले ही सरकार ने झूठा साबित कर दिया। चुनाव के उस ओपिनियन पोल की तरह जिसका काउंटिंग के दौरान रुझान कुछ और परिमाण कुछ और होता है। 

खैर...

"मन की बात" है 'मन' में रहे तो ज्यादा बेहतर होगा।


Thursday, March 30, 2023

आज भी राम राज्य की कल्पना अधूरी है



9 महीने के गर्व के बाद जब लाल की किलकारी घर में गूंजती है तो परिवार क्या समाज भी उत्साहित हो जाता है। आज के सोशल मीडिया के समय में ऐसे मौकों लोग बस गुनगुनाते हैं

 "हमारा बुझाता बबुआ DM होइए, 3 हिंद_के_सितारा_इ_त_CM_होई_हैं ओसे_उपरा_PM_होई_हैं_हो..." 

लेकिन जब हमारे राम आए थे (पहली बार, अब तो कल्पनाओं में आते हैं।)  तब माहौल था तो कुछ ऐसा ही लेकिन कल्पना DM और PM वाली नहीं थी। अब के माहौल में सोच के अच्छा लगता है की नहीं थी तभी तो अच्छा हुआ। क्योंकि जो प्रभु कर गए वह ना होता और ना शिक्षा देती।

क्योंकि... हमारे राम ऐसे है ही नहीं। हमारे राम तो सबके है। ये दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा सवर्ण और ना जाने क्या-क्या। ये सब के हैं। जो वर्तमान में है वह तो हमने बना दिया है और उम्मीद हम राम राज्य की करते है भला संभव हैं ?

खैर आज (#रामनवमी पर) हमने हर घर में गूंजते हुए सुना... "भय प्रकट कृपाला, दिन दयाला कौशल्या हितकारी..." वैसे मेरे राम हितकारी सबके लिए थे, हैं और आगे भी रहेंगे। ये पक्ष के भी है, विपक्ष के भी है। ये ग्रंथ फाड़ने वाले के भी हैं और लिखने वालों के भी हैं। यह देश राम का है। राम कण कण में हैं।भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र,सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। सबके अपने-अपने राम हैं। तभी तो आज आग उगलने वाले गेरुआ धारी भी राम को अपने रूप में देख रहे हैं, तो संतों की आत्माएं भी इन्हें अपना राम मानती है। सड़क पर भूखा हो या अस्पताल में बीमार सब राम को याद कर रहे हैं और उनके पास राम हमारे मौजूद भी होंगे। गांधी के राम अलग हैं। लोहिया के राम अलग। एक अटल के भी राम थे।वाल्मीकि और तुलसी के राम भी अलग अलग हैं। भवभूति के राम दोनों से अलग हैं। कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना। राम एक हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न।

वैसे तो इस धरती पर देवताओं की कमी नहीं। सबकी अपनी - अपनी लीला है लेकिन राम की सब से अलग है। प्रभु का इंसान बन के समाज को संदेश देने की जो भावना थी उसकी अमित छाप समझने वाले बखूबी समझते हैं तभी तो कभी कृतियों को फाड़ कर विकृति से राजनीति करते हैं, कभी धाम गमन से अमन की उम्मीद। 

              आज पक्ष और विपक्ष में आरोपों - प्रत्यारों का दौर ऐसा हो गया है की भाषा की मर्यादा को लांघ कोई कष्ट में है तो कोई रामराज्य के दावों पर विपक्ष को रौदने की कोशिशों का आरोपी बन रहा है। लेकिन उस राम राज्य का क्या जहां सत्ता विपक्ष के भत्ता पर भी नजर लगाए बैठी हो। इसे तानाशाही कहे तो अफसोस ना होगा। क्योंकि राम ने दुराचारियों को मारा तो मुक्ति का मार्ग दिया। लेकिन आज 'राम' पर राजनीति करने वाले भी मर्यादा को मिट्टी में मिला रहे हैं। और तो और हर घर में राम जैसा पुत्र की कामना करने वाली मां भी कौशल्या जैसी लालसा को बचा कर नहीं रख पाई हैं, ना कोई भाई भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न बनना चाहता है। गुरुओं को तो छोड़ दो, सीता सुकुमारी साबित करने वाली पत्नियों ने तो ऐसा माहौल बनाया है की उन्हें ना बेटों को परिवार से दूर करते वक्त दशरथ की पीड़ा दिखती है ना, समाज की नजरों में बुरी बनी मां कैकई का कष्ट। अब पुत्र लव-कुश भी नहीं रहे जो अपनी मां के हक़ के लिए लड़ सके।

पता है जो बचा है समाज में वो है बस दिखावा।  मन में श्रद्धा नहीं लेकिन दिल में दिखावा भगवान राम के लिए है। बड़े - बड़े डंडे में गेरुआ झंडे लगा "राम राज्य भी आएगा..." जैसे धुन पर प्रभु राम का गुणगान करने वाले कइयों को आज देखा और जानता भी हूं। जिसमें कई अपने पिता, माता, भाई, परिवार और अपनी पत्नी के प्रति भी वफादार नहीं है बावजूद राम राज्य की कामना कर रहा है। 

              अरे सुनो ऐसे राम राज्य नहीं आएगा। मेरे राम को देखो। 'ऐसे हैं मेरे राम' जिसने बाल्यकाल में ही माता को दिव्यदर्शन करा धन्य किया, ऋषियों के रक्षक बने, पीड़ित अहिल्या की व्यथा सुन श्राप मुक्त किया। पिता को खो दिया लेकिन वचन को बनाए रखा। सुख त्याग दिया लेकिन वन साथ ले जाने के लिए अनुमति दे पत्नी की खुशी का भी ख्याल रखा। कई राक्षसों को मारा तो जरूर लेकिन मुक्ति धाम दिया। दोस्ती ऐसी निभाई की दोस्त के लिए कलंकित भी हुए फिर भी उसके साथ खड़े रहे। भाई का साथ ऐसे निभाया की शेषनाग रूपी क्रोधित लक्षण को साथ रखा लेकिन पथ से कभी भटने ना दिया। सेना ऐसी बनाई की सबको अपने मन से काम की आजादी दी, एकछत्र राज नहीं किया। एक राज्य को उसके राजा से दूर किया (रावण को मार के) लेकिन उन्हें अनाथ नहीं छोड़ा। पत्नी से सालों दूर रहे लेकिन समाज का ख्याल रखा और प्यारी पत्नी को आग में झोंक दिया। राजा बने तो दुखी प्रजा को खुशी से भर दिया। भाला मेरे ऐसे राम के चरित्र से कुछ ना सीखे तो सिर्फ रामजन्म, रामनवमी और मंदिर बनाने से कुछ ना होगा। 

फिर सत्ता पर दोषारोपण, विपक्ष की कमजोरी, जाति- धर्म में भेद, और परिवार के प्रति लापरवाही ना कभी खत्म होगी और ना कभी राम राज्य आएगा।


(ये लेखक के अपने विचार है।)

Tuesday, March 28, 2023

अतीक तो बस बहाना था !

 देश की राजनीति, हालात और परिस्थिति आज भी चौका रही है और पहले भी कई बार लोगों को हैरान कर चुकी है। देश की राजनीति में जो हो रहा है यानी राहुल गांधी की सदन से सदस्यता जाना ये कोई नया नहीं है। अब तक लगभग 200 सांसद और विधायक कई आरोपों में सदन की सदस्यता गवां चुके हैं। लेकिन 4 साल पुराने मामले में कोर्ट में BJP नेता का दुबारा अर्जी लगाना और अचानक सूरत कोर्ट का नाटकीय अंदाज में फैसला आना किसी को पच नहीं पाया। नतीजन सोशल मीडिया में लोगों की प्रतिक्रिया और कांग्रेस की नाराजगी, राजघाट पर अनशन (जिसे पुलिस ने सुरक्षा का झांसा देकर अनुमति नहीं दी) और फिर अगले दिन कांग्रेस के आंदोलन की चेतावनी। बस क्या था एक नए खलनायक (अतीक) की Entry। पालकी सजी, रातो-रात यूपी पुलिस के जवान (45 की संख्या में) बाराती बने और फिर बारात निकली जो मीडिया को हाइजेक कर कांग्रेस के आंदोलन को मीडिया और लोगों से दूर कर दिया।

पहले से रची जा रही थी स्क्रिप्ट ?

राहुल गांधी ने 'भारत जोड़ो' यात्रा शुरू की तो BJP को लगा शायद ये यात्रा भी आलू से सोना निकलने जैसा सिद्ध होगा। लेकिन पहले फेस की यात्रा ने BJP की बेचैनी बढ़ा दी। यात्रा जब तक दक्षिण भारत में थी तब तक चैन की बंसी बजाने वाले BJP नेता, यात्रा के दिल्ली-यूपी पहुंचते ही फ्लॉप साबित करने में जुट गए। बावजूद यात्रा पूरी भी हुई और फिर शुरू भी...

देश में कई नेताओं ने यात्रा से इतिहास बदला है  कहानी कुछ ऐसी ही चल रही थी राहुल की।


फ़िर क्या था "ना रहिए बांस, ना बजी बांसुरी" वाली स्क्रिप्ट पर काम शुरू हुआ। वैसे सूरत कोर्ट के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा लेकिन BJP नेता का केस करना, वापस लेना और पुराने मामले में समय पर फैसला आना सब इत्तेफाक लगा।


और तो और कोर्ट के फैसले के महज चंद घंटों में सदस्यता जाना घर खाली करने की चेतावनी। सब कुछ अचानक होना भी परेशान कर रहा था। कांग्रेस की आंदोलन रूपी प्रतिक्रिया तो लाजमी थी।

लेकिन असल खेल तो तब शुरू हुआ जब प्रयागराज में उमेश पाल हत्याकांड में आरोपियों से कोसो दूर यूपी पुलिस अचानक एक्शन में दिखी। अब तक तो माफिया अतीक अहमद को साबरमती जेल (गुजरात) से लाने की चर्चा थी। लेकिन पुलिस की सोच से पहले कोर्ट ने ही अतीक को पुकार कर लिया। समझ ही नहीं आया कब कोर्ट से ऑर्डर हुआ (उमेश पाल अपहरण मामले में पेशी के लिए) ?, कब यूपी पुलिस की टीम बनी ? किसने ये तय किया की हवाई नहीं सड़क मार्ग से लायेंगे ?  ये सब तब दिखा जब साबरमती जेल के गेट पर पालकी सजी (यूपी पुलिस का कैदी वाहन) और दूल्हा को तैयार करने फूफा जी/जीजा जी (IPS रैंक के अधिकारी) जुट गए।



काफ़ी मान मन्नवल के बाद आखिरकार दूल्हा शाम के 5:44 मिनट पर निकला (ये जानते हुए की उसे पहुंचने में 24 घंटे का वक्त लग जायेगा) और अपने श्री मुख से पहली बार बोला "कोर्ट के कंधे पर बंदूक रखकर मेरी हत्या की कोशिश हो रही है"। अतीक की जेल यात्रा तब शुरू की गई जब कांग्रेस ने अगले दिन आंदोलन का ऐलान किया था

। आगे काम स्क्रिप्ट के बिलकुल मुताबिक था। मीडिया ने माहौल बनाया की विकास दुबे की तरह गाड़ी ना पलटे... 

"गाड़ी पलट जायेगी !" "यही रात अंतिम, यही रात भरी !"  "बस आज की रात है जिंदगी !" जैसे क्या क्या प्रोग्राम समाचार चैनलों पर चलने लगे और अतीत के काफिले के पीछे दौड़ने लगी राष्ट्रीय चैनलों की गाड़ियां। अतीक कहां रुका, कितना मूता, क्या बोला मीडिया ने दिखाया तो लोगों ने खूब देखा। इन सब के बीच दब गई तो राहुल गांधी की कहानी और कांग्रेस का मुद्दा जो जनता तक सही रूप में नहीं पहुंच पाई।

BJP बेदाग है ?

इस सवाल के जवाब के लिए यूपी के डिप्टी सीएम केशव मौर्य का बयान सटीक था जिन्होंने कहा था "जो हो रहा है अब कानून के मुताबिक हो रहा"।

वैसे जो हो रहा वो अब तक तो कानून के मुताबिक ही है लेकिन जो दिख नहीं रहा... 'वो खेल और थे'।

कोर्ट के आदेश के मुताबिक अतीक को लाना था। 1000 KM से अधिक का सफ़र यूपी पुलिस ने सड़क मार्ग से कर दिया ये जानते हुए भी अतीक खूंखार अपराधी था। प्रदेश के छुटभैये नेता आजकल चौपर में चलने लगे हैं लेकिन सवाल था। क्या मौहौल बनाना था। या यूपी पुलिस को चौपर अफोर्ड करने के लिए पास में पैसे नहीं थे। लेकिन मुद्दा था मनसा की, जो सरकार की ठीक नहीं थी। सरकार के पास ऐसे तंत्र हैं जो ये जानते थे की अगर अतीक को सड़क से लायेंगे तो गाड़ी पलटने का मुद्दा फिर गर्म होगा। इससे सरकार और यूपी पुलिस का खौफ अपराधियों में तो जायेगा ही मीडिया भी अतीक जैसे अपराधी की दुर्दशा दिखा कर TRP बटोरेगी। क्योंकि इस मुद्दे के सामने राहुल भी बौने हो जायेगे। इसका फायदा देखिए राहुल को घर निकला का फरमान आया है ये बहुत को तो पता भी नहीं। इतना ही नहीं सदन से सदस्यता जाने का मामला तो समझो खत्म ही हो गया।

अब सुनिए बचा हुआ जो कसर था उसका प्लान अतीक का भाई अशरफ से पूरा हो गया। मतलब शाम 5 बजे अतीक नैनी जेल पहुंच गया। ऐसा लगा की कांग्रेस के आंदोलन का मुद्दा Prime Time में उठ ना जाए इसलिए खेल ऐसी रची गई थी कि अशरफ की शिफ्टिंग भी नैनी में हो गई। अगर आज की सुनवाई के लिए एक दिन पहले अशरफ को शिफ्ट गया। फिर इस तरह देखे तो लगभग हर सप्ताह कोर्ट में पेशी के लिए महाराजगंज जेल से कानपुर लगभग साढ़े 400 किमी SP विधायक इरफान सोलंकी को भी तो यूपी पुलिस लाती है। लेकिन  बात तो कुछ और थी।

           "अतीक तो बस बहाना था "


(ये लेखक के स्वतंत्र विचार है)


Sunday, March 26, 2023

पत्रकारिता का स्तर गिरा रहे "प्रवक्ता"

 पत्रकारिता का स्तर गिरा रहे "प्रवक्ता"


पत्रकार होने के नाते पत्रकारिता जैसे पेशे पर बोलना और उसमें भी उन लोगों के खिलाफ़ जिनको देख कर या जिन्हें अपना रोल मॉडल भी इंसान मानता हो। लेकिन बीते 24 घंटे में जो देखा उसे बोलने से रोक नहीं पाया। 

            बीते 24 घंटे में राजनीति गलियारे में राहुल गांधी की सदन से सदस्यता ख़त्म होने के बाद ख़ूब उथल-पुथल हुई। तो पार्टी के समर्थकों और विपक्षी नेताओं ने BJP पर आरोप


लगाए। पूरे दिन भर कां कांग्रेस-BJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस चली। आरोप प्रत्यारोप का भी दौर रहा। इन सब का बीच एक उथल - पुथल थी सोशल मीडिया में सम्मानित 'गणमान्यों' (पत्रकार) बीच में। जो पत्रकार नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता बने पत्रकारिता के स्तर को खुद की पैरों की जुत्ती से रौंद रहे थे। जिसका मज़ा आम और ख़ास सब उड़ा रहे थे। ऐसे में अगर हम नवोदित पत्रकारों की गलतियां, कथिक पत्रकारों के करतूत और यूट्यूबरों की खामियों को गिनाएं तो शायद नाइंसाफी होगी। 

             मुद्दा समझिए ! दरअसल राहुल गांधी की सदस्यता ख़त्म होने के बाद अखबारों से लेकर TV मीडिया तक Breaking और कार्यक्रमों की होड़ देखी गई। सब महोदयों ने अपने - अपने स्तर से ख़बर को परोसा क्योंकि सभी महोदायों के अपने दर्शक हैं लेकिन कुछ महोदयों को कुछ की बाते रास नहीं आई और दिव्यदृष्टि रूपी अलौकिक ज्ञान से हमला किया फिर क्या सिलसिला शुरू हुआ और जनता भी मजे लेने लगी। 





स्थिति तो ऐसी थी की कई महोदय गली गलौज तक भी कर रहे थे। 

इन महोदयों के करना कुछ लोग तो बड़े - बड़े सवाल भी करने लगे थे। ये हिम्मत आज आपसी फजीहत के कारण है।

                   सवाल ये है की सबको अभिव्यक्ति की आजादी है। ये आजादी सबके पास है आम हो या ख़ास। उसी में कुछ महोदय अपने संस्थान और अपनी निजी विचारों के मुताबिक भी ख़बर परोसते हैं। जिनमें कोई सरकार का पक्षधर है तो किसी को   केंद्र की वर्तमान सरकार के 8 साल के कार्यकाल में आजतक कुछ दिखा ही नहीं सिवा कमियों के बावजूद दूसरों की सोच पर ताना दे रहे हैं। ये सत्य है की भारतीय पत्रकारिता का शुरुआती दौर की पत्रकारिता का वक्त नहीं है और ना ही अख़बार/समाचार की वह क्रांति जिसने आजादी के लिए जल रही अग्नि में घी का काम किया। बल्कि ये औद्योगिक युग है इसकी पत्रकारिता फ़ायदे और लालच की आंच पर पाक रही है। हां ये आंच सबके अलग - अलग है। कोई कांग्रेस की आंच पर रोटी सेंक रहा, कोई BJP की चूल्हे पर दाल गला रहा। कोई ऐसा भी है जो चूल्हा अपना बता रहा लेकिन उसकी आग किसी और के चूल्हे की है फिर भी वह इसकी रोटी - उसकी रोटी करने में तुला हुआ है। समझ ये नहीं आता की क्या ये तू तू मैं मैं करने के उनकी पत्रकारिता चमक रही है या उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है की उनके ही द्वारा तैयार किए गए पत्रकारिता के बेहतर स्तर में अब बट्टा लग रहा है। जहां एक तरफ ऐसे सम्मानित लोगों के बीच आरोप प्रत्यारोप और दूसरी तरफ कथित पत्रकार और समाचार यूट्यूब चैनल पर अनसुलझे पत्रकारों के काम के कारण स्थिति ऐसी हो गई है की कभी पेशे में पत्रकारिता बताने पर नाम मात्र की काफ़ी था पहचान के लिए आज स्थिति वह नहीं रह गई है। अब पत्रकार ही पार्टियों के प्रवक्त बन बैठे हैं और प्रवक्त संबंधित चैनलों के लिए बहस का सुरक्षित ठिकाना। पत्रकार जो सरकार की कमियों और उपलाधियों को जनता तक पहुंचाए और जनता की समस्या सरकार तक पहुंचाए वाला फॉर्मूला सिर्फ किताब के पन्नों तक ही सिमटकर रह गया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो ना ही जानता सुख से रह पाएगी और ना ही लोकतंत्र की सही परिभाषा का व्याखान होगा। मेरा तो कहना है जो जैसे रहा उसे रहने दें अब

"हे देश के नए कर्णधारों, अथक पथ पर तुम पधारो,

नई युग की नई किरण से, लोक तंत्र को तुम सवारों।।"

Friday, March 24, 2023

राहुल गांधी की गलती का लालू यादव ने भी चुकाया था मोल, आज राहुल के गले ही आ पड़ी संकट

"राजनीति" ये ऐसा खेल है जहां प्रतिद्वंदी अपने सामने वाले की गलती का फायदा नहीं उठाया तो वह मूर्ख है, और BJP जो कर रही है वह मूर्खता नहीं बल्कि चालाकी है। जो आज BJP कर रही है जिसकी बिसाद कांग्रेस ने ही तो बिछाई है। लेकिन कहते हैं न "जिसकी लाठी उसकी भैंस" खैर... बात आज कांग्रेस नेता और वायनार्ड से पूर्व सांसद राहुल गांधी की, जो पल भर में वर्तमान से पूर्व हो गए।

ये सर्व विदित है की राहुल गांधी की सदस्यता क्यों गई। अब उससे आगे... 

बात साल 1951की है कांग्रेस सांसद थे एच जी मुदगल जिन पर पैसे लेकर सवाल पूछने का आरोप लगा जांच में दोषी हुए, कार्रवाई हुई और देश में पहली बार किसी की सदन की सदस्यता खत्म हुई । जिसकी कार्रवाई को लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था "ऐसे सांसदों पर अगर कार्रवाई नहीं हुई तो जनता में गलत संदेश जाएगा।" तब से शुरू हुई ये प्रथा ऐसी बन गई की इन सात दशक में कुल 6 मामलों में 16 सांसदों (लोकसभा/राजसभा) जिसमें गांधी परिवार से 2 (इंद्रा और राहुल) सांसद शामिल हैं। 


पहली सरकार में (जब देश में आम चुनाव नहीं हुआ था) प्रचलित की गई प्रथा ऐसी बनी की 11 जुलाई 2013 में लिली थॉमस बनाम भारत सरकार के मुद्दे पर SC ने इसे नेताओं के लिए बेड़ी बना दी। कोर्ट ने कहा की 2 साल की सजा मिले नेता उसी दिन से सांसद के लिए अयोग्य हो जायेंगे। ये संकट बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीम Lalu Prasad Yadav के लिए चारा घोटाले में फैसले के बाद संकट बनी तक केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने सदन में एक अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावहीन करने की तैयारी में थी। कांग्रेस सरकार के अध्यादेश में था की दोषी नेताओ को 3 महीने का समय मिले ताकि वह अपील कर सके। लेकिन इस अध्यादेश की कॉपी को राहुल ने 27 सितंबर 2013 को फाड़ दिया था। जिसके बाद सरकार ने अध्यादेश को वापस ले लिया। अगर आज वह अध्यादेश लागू होती तो राहुल गांधी की स्थिति ये नहीं होती। 

 राहुल गांधी की सदस्यता ख़त्म होने के बाद कांग्रेस के साथ लगभग सभी विपक्षी दल हो-हंगामा कर रहे हैं। केंद्र सरकार को घेरने की पूरी तैयारी है लेकिन इस स्थिति को खड़ा करने वाले खुद कांग्रेस और राहुल गांधी हैं। अगर राहुल गांधी जनता के सामने और अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं के फैसले (अध्यादेश) को दरकिनार ना किए होते आज मुश्किल में ना होते। ये फैसले राहुल की उज्ज्वल भविष्य और गर्त में जाति राजनीति सफर का कारण भी बन सकता है। लेकिन कहीं ना कहीं BJP के लिए ये चाल फांस भी बनती हुई दिख रही है।

               अगर इस पूरे फैसले को इतमीनान से देखें तो मुझे अफ़ज़ल मिनहास की एक शायरी या आ रही है।


         "क्या फ़ैसला दिया है अदालत ने छोड़िए"

       "मुजरिम तो अपने जुर्म का इक़बाल कर गया"