"राजनीति" ये ऐसा खेल है जहां प्रतिद्वंदी अपने सामने वाले की गलती का फायदा नहीं उठाया तो वह मूर्ख है, और BJP जो कर रही है वह मूर्खता नहीं बल्कि चालाकी है। जो आज BJP कर रही है जिसकी बिसाद कांग्रेस ने ही तो बिछाई है। लेकिन कहते हैं न "जिसकी लाठी उसकी भैंस" खैर... बात आज कांग्रेस नेता और वायनार्ड से पूर्व सांसद राहुल गांधी की, जो पल भर में वर्तमान से पूर्व हो गए।
ये सर्व विदित है की राहुल गांधी की सदस्यता क्यों गई। अब उससे आगे...
बात साल 1951की है कांग्रेस सांसद थे एच जी मुदगल जिन पर पैसे लेकर सवाल पूछने का आरोप लगा जांच में दोषी हुए, कार्रवाई हुई और देश में पहली बार किसी की सदन की सदस्यता खत्म हुई । जिसकी कार्रवाई को लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था "ऐसे सांसदों पर अगर कार्रवाई नहीं हुई तो जनता में गलत संदेश जाएगा।" तब से शुरू हुई ये प्रथा ऐसी बन गई की इन सात दशक में कुल 6 मामलों में 16 सांसदों (लोकसभा/राजसभा) जिसमें गांधी परिवार से 2 (इंद्रा और राहुल) सांसद शामिल हैं।
पहली सरकार में (जब देश में आम चुनाव नहीं हुआ था) प्रचलित की गई प्रथा ऐसी बनी की 11 जुलाई 2013 में लिली थॉमस बनाम भारत सरकार के मुद्दे पर SC ने इसे नेताओं के लिए बेड़ी बना दी। कोर्ट ने कहा की 2 साल की सजा मिले नेता उसी दिन से सांसद के लिए अयोग्य हो जायेंगे। ये संकट बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीम Lalu Prasad Yadav के लिए चारा घोटाले में फैसले के बाद संकट बनी तक केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने सदन में एक अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावहीन करने की तैयारी में थी। कांग्रेस सरकार के अध्यादेश में था की दोषी नेताओ को 3 महीने का समय मिले ताकि वह अपील कर सके। लेकिन इस अध्यादेश की कॉपी को राहुल ने 27 सितंबर 2013 को फाड़ दिया था। जिसके बाद सरकार ने अध्यादेश को वापस ले लिया। अगर आज वह अध्यादेश लागू होती तो राहुल गांधी की स्थिति ये नहीं होती।
राहुल गांधी की सदस्यता ख़त्म होने के बाद कांग्रेस के साथ लगभग सभी विपक्षी दल हो-हंगामा कर रहे हैं। केंद्र सरकार को घेरने की पूरी तैयारी है लेकिन इस स्थिति को खड़ा करने वाले खुद कांग्रेस और राहुल गांधी हैं। अगर राहुल गांधी जनता के सामने और अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं के फैसले (अध्यादेश) को दरकिनार ना किए होते आज मुश्किल में ना होते। ये फैसले राहुल की उज्ज्वल भविष्य और गर्त में जाति राजनीति सफर का कारण भी बन सकता है। लेकिन कहीं ना कहीं BJP के लिए ये चाल फांस भी बनती हुई दिख रही है।अगर इस पूरे फैसले को इतमीनान से देखें तो मुझे अफ़ज़ल मिनहास की एक शायरी या आ रही है।
"क्या फ़ैसला दिया है अदालत ने छोड़िए"
"मुजरिम तो अपने जुर्म का इक़बाल कर गया"
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