देश-विदेश में बहुचर्चित भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्व प्रसिद्ध (ये मैं नहीं कह रहा) रेडियो कार्यक्रम "मन की बात" के 100 एपिसोड पूरे होने पर BJP ने पूरा तामझाम (प्रचार) किया। 100वें एपिसोड को सुनने के लिए दिल्ली में जाने माने 100 हस्तियों को बुलाया। मंदिर नहीं, मदरसों में तालीम लेने वाले बच्चे "मन की बात" कार्यक्रम सुनते
नजर आएं। BJP के परिश्रमी सांसदों ने अपने अपने चुनाव क्षेत्रों में कार्यक्रम सुनने के लिए विशेष व्यवस्था कराई। कई चैनलों के 20-40 मिनट तक के स्लॉट भी खरीदे गए होंगे (कोई प्रमाण नहीं है।) क्योंकि कार्यक्रम को सफल बनाना था।
अखबारों और मीडिया में शानदार पंच लाइन के साथ कार्यक्रम की सफलता का श्रेय कुछ ने पीएम मोदी और पीएम ने देशवासियों को दिया। कार्यक्रम के बाद ये सिर्फ़ प्रोग्राम ही नहीं आस्था का पर्व बन गया। बची खुची कसर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के एक सर्वे ने पूरी कर दी।
सूचना प्रसारण मंत्रालय ने सर्वे में दावा किया की IIMC (Indian Institute of mass Communication) की रिपोर्ट में "मन की बात" कार्यक्रम बेजोड़ है। सचाई देखिए: सर्वे में 76% लोगों में 63 फीसदी ने कहा की वह Youtube पर इस कार्यक्रम को पसंद करते हैं।
![]() |
| IIMC का Report |
40 फीसदी ने इसे पाठशाला के तौर पर देखा जहां गुमनाम समाज और शिल्पियों से श्रोता रूबरू हुए। IIMC का सर्वे आप Google में सर्च कर के देख लीजिए हर अखबारों की हेडलाइन में मिल जायेगा।
अब इस सर्वे से पहले का एक सच सुनिए। दरअसल जब 'मन की बात' कार्यक्रम के 100वें एपिसोड को ऐतिहासिक बनाने के लिए BJP नेता तैयारी कर रहे थे, PM MODI फ़िल्म शूट करा रहे थे तब सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) ने 'मीडिया इन इंडिया: एक्सेस, प्रैक्टिसेज, कंसर्न्स एंड इफेक्ट्स' शीर्षक से एक अध्ययन प्रकाशित किया।
CSDS ने अपने शोध में दावा किया की प्रधानमंत्री मोदी के "मन की बात" कार्यक्रम को 62% लोग ने कभी नहीं सुना मतलब आधे से अधिक आबादी इस रेडियो कार्यक्रम से दूर है। वहीं मात्र 5% आबादी इसे हमेशा सुनती है, 5% ने कुछ महीने और 5% कभी कभार सुन लेते हैं। इतना ही नहीं 7% ने कुछ महीने सुनकर छोड़ा जबकि 21% ने एक-दो बार सुना है। मतलब कुल मिला भी देखें तो 48% आबादी जो की नहीं सुनने वालों की संख्या से कम है। अब इस रिपोर्ट को अगर सांसद, मंत्री, विधायक या कोई मोदी भक्त खारिज भी करें तो एक और गौर करनेवाली बात पर ध्यान दें।
साल 1936 में 'इंपोरियल रेडियो ऑफ इंडिया' (जो बाद में ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बना) की शुरुआत के बाद से बीच के कुछ दशक को छोड़ दें तो पहले टीवी और अब मोबाइल के आने के बाद आज रेडियो की स्थिति से आप भी अनजान नहीं होंगे।
खैर आपको आंकड़ा बताते हैं। साल 2022 में विश्व रेडियो दिवस (13 फरवरी) के मौके पर छपे दैनिक जागरण, झारखंड के एक लेख के मुताबिक रेडियो खांची के फाउंडर डायरेक्टर डॉ. आनंद कुमार ठाकुर बताते हैं कि उनके रेडियो (जो युनेस्को में चयनित है) को 7-10 फीसदी श्रोता सुन लेते हैं। ऐसे में अनुमान आप लगाएं तो AIR को सुनने वालों की संख्या भी कुछ वैसे ही होगी। चलिए इसे बढ़ा कर हम 20% भी कर लें तो सिर्फ 1 कार्यक्रम के लिए लोगों के प्यार को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। क्योंकि जहां वेब सिरीज और युवाओं के लिए रापचिक/डिस्को/डीजे गानों की धुन पर धूम धड़क करने की आदत है वह PM के ज्ञानवर्धन को मुझे नहीं लगता की सुनता होगा। जो कुछ बचे होंगे उन्हें gaana, Jio Music, Youtube जैसे स्थानों से फुरसत नहीं होगी। कुछेक प्रतिभावान होंगे उन्हें छोड़ दें फिर भी।
खैर PM हैं और योग्यता का भंडार है तो उनके कार्यक्रम के लिए इतना प्यार स्वीकारा जा सकता है।
लेकिन सवाल उस रिपोर्ट (CSDS) का है जिसे आम जनता तक आने से पहले ही सरकार ने झूठा साबित कर दिया। चुनाव के उस ओपिनियन पोल की तरह जिसका काउंटिंग के दौरान रुझान कुछ और परिमाण कुछ और होता है।
खैर...
"मन की बात" है 'मन' में रहे तो ज्यादा बेहतर होगा।



No comments:
Post a Comment