Friday, July 28, 2017

नाराज़ हुए "गुरु द्रोण"

गुरु-शिष्य के रिश्तों की कहानियां तो हमने बहुत सुनी है। जिसमें हमेशा गुरु के ज्ञान के लिए आतुर शिष्य ने अपना हर कुछ त्याग कर दिया। पर राजनीति ने आज इस कहानी में भी एक नया बदलाव कर दिया है।
हमने अब तक अपने शिष्य से गुरु को नाराज़ होते नहीं देखा था, लेकिन बिहार के विधान सभा में नाराज़ गुरु-शिष्य संवाद को देख कर हैरानी हो रही थी।
     आज बिहार विधान सभा में राजद-जदयू-कांग्रेस के महा गठबंधन से अलग होने के बाद, राज्य के पुनः मुख्यमंत्री बनने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बहुमत साबित करने का दिन था। मुख्यमंत्री ने 243 विधायकों में से 131विधायकों के समर्थन से बहुमत सिद्ध किया। जिसके बाद सदन में पिछले 20 महीने से पक्ष में बैठने वालें विधायक आज विपक्ष में बैठे थे। पर नज़ारा देखने वाली ये थी कि आज पक्ष में बैठने वालें गुरु के ठीक विपरीत उनका शिष्य विपक्ष की अगुआई कर रहा था।
      मेरे इस गुरु शिष्य के संबंध से आप शायद ये समझ नहीं रहे होंगे कि ये रिश्ता मैंने कैसे तय किया है। इसे समझने के लिए मैं आपको थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।
       2015 में बिहार विधान सभा चुनाव में BJP के रथ को रोकने के उद्देश्य से राजद-जदयू-कांग्रेस ने महागठबंधन बना कर चुनाव लड़ा। चुनाव हुई और गठबंधन को बिहार की जनता का भारी समर्थन मिला। इस गठबंधन में राजद 10 वर्षों के बाद बिहार की जनता का बहुत अधिक समर्थन जुटाने में सफ़ल हुई थी। अब मौका था सीट बंटवारे का। इस चुनाव में राजद के दो होनहारों ने पहली बार अपना भाग्य आजमाया और सफल भी हुए। जिनकी मंत्री पद में दावेदारी बहुत ही अहम थी। मंत्री पद बटवारा चर्चा का विषय था, चुकी इस बार राजद सुप्रीमों का चुनाव में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग था, क्योंकि वह कोर्ट के द्वारा चुनाव में शामिल नहीं होने का दंश झेल रहे थे।
मंत्री पद का बटवारा हुआ, तो राजद सुप्रीमों ने अपने अर्जुन (तेजस्वी प्रसाद यादव) को जो क्रिकेट के धुरंधर बनने के लिए खेल की दुनिया में भाग्य आजमा कर वापस आये हुए पुत्र को उपमुख्यमंत्री तो कृष्ण की बांसुरी से प्यार करने वाले बेटे तेजप्रताप को बिहार की जनता के स्वास्थ्य का ख़्याल रखने के लिए स्वास्थ्य मंत्री बना दिया। मीडिया ने जब सवाल करना शुरू किया कि राजनीति का सही से ज्ञान नहीं होने के वावजूद भी लालू ने दोनों बेटों को इतना बड़ा पद दिया तो राजद सुप्रीमों लालू और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ये कहते नहीं थके की "आज नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे जिम्मेदारी" यहां तक कि एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर अपने साक्षात्कार में राबड़ी देवी ने कहा था कि "मेरे दोनों बेटे अपने चाचा नीतीश से राजनीतिक के गुर सीखेंगे, और बिहार की जनता के लिए बहुत कुछ करेंगे"।
हुआ ऐसा ही, दोनों बेटे चाचा नीतीश से कुल 20 महीने तक राजनीति सीखें।
लेकिन सही कहा जाता है कि गुरु गुड़ ही रहें चेला चीनी हो गया। नीतीश अपने गुरु ज्ञान तो दे ही रहे थे कि चेला ने चीनी बनने का काम किया।
समय ने पलटवार किया और आज ऐसा समय आया कि अब गुरु चेला के साथ निर्वहन करने को तैयार नहीं है।
        समय के बदलाव के साथ ही जिस गुरु द्रोणाचार्य के राजनीति शिक्षा के क़ायल लालू-राबड़ी ने अपने ही हाथों, अपने दोनों बेटों को सौप था आज वे ही गुरु की ज्ञान को ग़लत बताने से थक नहीं रहें है। सोचने वाली बात है कि गठबंधन टूटने के कुछ ही घंटे बाद लालू जी को गुरु नीतीश की जो कमियां याद आई, दरअसल वह मामल सन 1991 का है। अब आप ही बताएं क्या लालू जी नीतीश को गुरु बनाने से पहले ये बात नहीं जानते थे, या फिर सत्ता के लिए ओ किसी दागी को भी अपना हमसफ़र बनाने में संकोच नहीं कर सकतें है।
    खैर बात जो भी आज जिस तरह से गुरु और शिष्य का संवाद चला ओ सुनने लायक था। शिष्य तेजप्रताप अपने गुरु को ये कहतें है कि "आपने कहा क्यों नहीं, मैं इस्तीफ़ा जरूर दे देता, पर आपको तो जाना था। आपने बिहार की जनता के साथ विश्वासघात किया है।"
एकलव्य बनने वाले शिष्य तेजस्वी शायद ये भूल गए थे कि नीतीश और उनके बीच में 45 मिनट तक बंद कमरे में बात हुई थी, उन्होंने नीतीश के इशारे को नहीं समझा हो, पर नीतीश की पीड़ा आज उनके भाषण में साफ़ झलक रही था। अपने एक-एक सवाल का सही समय पर जवाब देने के उद्देश्य के साथ ही, हर बात को सदन के अंदर और सदन के बाहर हमेशा कहूंगा के हौसले हमेशा की तरह आज भी ताज़ा लग रहा था। गुरु नीतीश बिहार की जनता के साथ विश्वशघात पर कहतें है कि "बिहार की जनता ने मुझे चुना सेवा करने के लिए चुना, राजभोग के लिए नहीं। अपने शिष्य और उनके परिवार से छुब्ध नीतीश ने यहां तक कह दिया कि मेरे लिए इनके साथ रहना संभव नहीं था इसलिए हमने ख़ुद को अलग कर लिया। अपने शुरुआत के सफ़र और समता पार्टी के निर्माण की शुरुआत तक कि याद दिलाते हए नीतीश कहतें है कि हम शुरुआत से ही जैसे शिक्षक थे वैसे ही रहेंगे, अपने शिष्य या उसके परिवार के लिए ख़ुद को कभी नहीं बदल सकतें है।
       अब देखने वाली बात होगी कि बिहार के इस राजनीति महाभारत में शिष्य अर्जुन परास्त होतें है या गुरु द्रोणाचार्य। क्योंकि दोनों खेमा महाभारत की तरह ही भारी है।
जहां कौरव पक्ष (NDA) में नीतीश कुमार (सेनापति-गुरु द्रोण), नरेंद्र मोदी (भीष्मपितामह), शुशील मोदी (मामा शकुनि), अमित शाह (दुर्योधन) जैसे धुरंधर है तो विपक्ष में बैठे शिष्य अर्जुन (तेजस्वी) के साथ खेल में नहीं होते हुए भी खेल खेलाने वाले श्रीकृष्ण (लालू यादव) एक दूसरे पर भारी है।

Sunday, July 23, 2017

मैच हारा, दिल जीत कर !

हरे-हरे घास भरे मैदान पर लड़की के हाथ से छूटी लाल गेंद का विकेट तोड़ना,
तो कहीं दौड़ लगती लड़की के लम्बे बाल का खुलने से संवारने तक का नज़ारा...
अगर कहीं मोहीत करता है, तो ओ है सबसे बड़े रोमांचक खेल क्रिकेट की महिला ब्रिगेडियर के साथ।
         अगर ये नज़ारा आज साक्षी बना है तो इसके पीछे भारत की उन बेटियों का लगन और परिश्रम जुड़ा है जिन्होंने अपना सब कुछ इस क्रिकेट को समर्पित कर दिया है।
            आज लॉर्ड्स (लंदन) के ऐतिहासिक मैदान में भारत की इस बेटियों को पसीना बहाते देख सीना चौड़ा हो रहा था।
             हमारे देश में भले ही सबको बराबर का अधिकार प्राप्त है लेकिन फिर भी हर जगह पुरुष प्रधानता की बू जरूर आ जाती है, और उसका ही कारण था कि आजतक हम भारतीय (कुछ ख़ास को छोड़ कर) क्रिकेट में सिर्फ लड़को को ही जानते थे।
पिछले कुछ समय में तो ये भी सवाल सुन लिया कि #लड़कियां_भी_क्रिकेट_खेलतीं_है ?
और ये सच भी है।
              महिला क्रिकेट टीम के इतिहास पर थोड़ा गौर करें तो देखा जाता है कि भारत में महिला क्रिकेट की शुरुआत 1973 से माना जाता है, जब महिला क्रिकेट संघ की स्थापना हुई,(वैसे भारत में क्रिकेट 16वी शताब्दी में ही आ गया था, और पहला मैच पुरुषों के द्वारा 1721 में खेला गया था।) हालांकि भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने सन 1976 में पहला मैच "वेस्टइंडीज" के खिलाफ़ खेला था। धीरे-धीरे सफ़र तय करता हुआ महिला विंग 2006 में इतना काबिल बन चुका था कि भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) ने उसे अपने में समाहित करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। इस तरह 2006 में महिला क्रिकेट संघ के BCCI में विलय के बाद इनकी नाव कुछ तेज हुई। भारत की इन झाँसीयों की लगन और कठिन परिश्रम का परिणाम ही है की कम मेहनताना और सही सम्मान नहीं मिलने के वावजूद भी अपनी काबिलियत के बदौलत लोहा मनवाया और आज यह बहुतों के दिलों पर राज कर रहीं है।
           भारत की झाँसीयों ने आज 2017 विश्व कप के फाइनल मुकाबले में जीत के लक्ष्य के साथ ही इतिहास को बदलने उत्तरी थी। हालांकि अफ़सोस जनक हार का इन्हें सामना करना पड़ा। आज भारत की टीम जीत जाती तो ये भारतीय महिला क्रिकेट टीम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाता। क्योंकि आजतक भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्वकप नहीं जीता है, इस से पूर्व महिला टीम ने सन 2005 में विश्व कप के फाइनल में पहुँची थी जहां उन्हें ऑस्ट्रेलिया के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।
         ख़ैर खेल,खेल होता है और इसे खेल की भावना से ही देखना चाहिए। लेकिन आज मुझे गर्व इस बात का हो रहा है था कि आज के इस मैच पर बहुत से लोगों का नज़र बना हुआ था। इससे भी बड़ी बात ये है कि उन बहुत से नज़र में कुछ ऐसे भी नज़र थे जो दिन में एक ही TV कार्यक्रम दिन में 4 बार दे तो 4 बार देखने वाले भी शामिल थे। मुझे ख़ुशी इस बात की नहीं है कि ये नज़र शामिल हुए, बल्कि खुशी इस बात कि है, कि बदलते भारत के नज़र ने कुछ और नया देखा। संभवतः इस ख़ास नज़र के नज़रियों में कोई ऐसा भी होगा जो एक दिन उस हरी-भरी घास को रौंदता नज़र आए।
             आज के इस शानदार और रोमांचक मुकाबलेे को देख कर मुझे ऐसा नहीं लगा कि कही भी कोई ऐसी ख़ास तरह की कमियां रहीं हो जो प्रधान पुरुषों के मुकाबले इन झाँसीयों में अधिक हो। लड़ाई और रोमांच इनमें भी कूट कर भरा हुआ था।
        इस मैच को देखने के बाद अब आगे भी इनसे लोगों की उम्मीद और बढ़ गई होगी। और ऐसा होना भी चाहिए। बड़ी ख़ुशी होती है जब आपकी मेहनत के मुताबिक मेहनताना मिले।
इन खिलाड़ियों को भी उम्मीद होती है, और देखा जाए तो इस वर्ष इन खिलाड़ियों ने बहुत सराहना भी बटोरा है अब देखने वाली बात है कि इनके साथ आगे कितना न्याय होता है। अब तो बहुत अफ़सोस होगा जब अखबारों की शुर्खियाँ बन कर ये लड़कियां अपनी मेहनताना की दरकार करेंगी तो।
             सरकार से उम्मीद करूँगा कि इस झाँसीयों को भी उम्मीदतन सहायता उपलब्ध कराया जाय और प्रसारण संबधी मामलों पर विचार-विमर्श कर हर भारत वासियों तक इनकी पहुँच सुनिश्चित कर पुरुष-महिला भेद-भाव को ख़त्म किया जाय।
 क्योंकि आज इस बेटियों न फ़िल्म दंगल कि संवाद को सच कर दिखाया है कि...
म्हारी_बेटियां_भी_छोरो_से_कम_है_के