गुरु-शिष्य के रिश्तों की कहानियां तो हमने बहुत सुनी है। जिसमें हमेशा गुरु के ज्ञान के लिए आतुर शिष्य ने अपना हर कुछ त्याग कर दिया। पर राजनीति ने आज इस कहानी में भी एक नया बदलाव कर दिया है।
हमने अब तक अपने शिष्य से गुरु को नाराज़ होते नहीं देखा था, लेकिन बिहार के विधान सभा में नाराज़ गुरु-शिष्य संवाद को देख कर हैरानी हो रही थी।
आज बिहार विधान सभा में राजद-जदयू-कांग्रेस के महा गठबंधन से अलग होने के बाद, राज्य के पुनः मुख्यमंत्री बनने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बहुमत साबित करने का दिन था। मुख्यमंत्री ने 243 विधायकों में से 131विधायकों के समर्थन से बहुमत सिद्ध किया। जिसके बाद सदन में पिछले 20 महीने से पक्ष में बैठने वालें विधायक आज विपक्ष में बैठे थे। पर नज़ारा देखने वाली ये थी कि आज पक्ष में बैठने वालें गुरु के ठीक विपरीत उनका शिष्य विपक्ष की अगुआई कर रहा था।
मेरे इस गुरु शिष्य के संबंध से आप शायद ये समझ नहीं रहे होंगे कि ये रिश्ता मैंने कैसे तय किया है। इसे समझने के लिए मैं आपको थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।
2015 में बिहार विधान सभा चुनाव में BJP के रथ को रोकने के उद्देश्य से राजद-जदयू-कांग्रेस ने महागठबंधन बना कर चुनाव लड़ा। चुनाव हुई और गठबंधन को बिहार की जनता का भारी समर्थन मिला। इस गठबंधन में राजद 10 वर्षों के बाद बिहार की जनता का बहुत अधिक समर्थन जुटाने में सफ़ल हुई थी। अब मौका था सीट बंटवारे का। इस चुनाव में राजद के दो होनहारों ने पहली बार अपना भाग्य आजमाया और सफल भी हुए। जिनकी मंत्री पद में दावेदारी बहुत ही अहम थी। मंत्री पद बटवारा चर्चा का विषय था, चुकी इस बार राजद सुप्रीमों का चुनाव में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग था, क्योंकि वह कोर्ट के द्वारा चुनाव में शामिल नहीं होने का दंश झेल रहे थे।
मंत्री पद का बटवारा हुआ, तो राजद सुप्रीमों ने अपने अर्जुन (तेजस्वी प्रसाद यादव) को जो क्रिकेट के धुरंधर बनने के लिए खेल की दुनिया में भाग्य आजमा कर वापस आये हुए पुत्र को उपमुख्यमंत्री तो कृष्ण की बांसुरी से प्यार करने वाले बेटे तेजप्रताप को बिहार की जनता के स्वास्थ्य का ख़्याल रखने के लिए स्वास्थ्य मंत्री बना दिया। मीडिया ने जब सवाल करना शुरू किया कि राजनीति का सही से ज्ञान नहीं होने के वावजूद भी लालू ने दोनों बेटों को इतना बड़ा पद दिया तो राजद सुप्रीमों लालू और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ये कहते नहीं थके की "आज नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे जिम्मेदारी" यहां तक कि एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर अपने साक्षात्कार में राबड़ी देवी ने कहा था कि "मेरे दोनों बेटे अपने चाचा नीतीश से राजनीतिक के गुर सीखेंगे, और बिहार की जनता के लिए बहुत कुछ करेंगे"।
हुआ ऐसा ही, दोनों बेटे चाचा नीतीश से कुल 20 महीने तक राजनीति सीखें।
लेकिन सही कहा जाता है कि गुरु गुड़ ही रहें चेला चीनी हो गया। नीतीश अपने गुरु ज्ञान तो दे ही रहे थे कि चेला ने चीनी बनने का काम किया।
समय ने पलटवार किया और आज ऐसा समय आया कि अब गुरु चेला के साथ निर्वहन करने को तैयार नहीं है।
समय के बदलाव के साथ ही जिस गुरु द्रोणाचार्य के राजनीति शिक्षा के क़ायल लालू-राबड़ी ने अपने ही हाथों, अपने दोनों बेटों को सौप था आज वे ही गुरु की ज्ञान को ग़लत बताने से थक नहीं रहें है। सोचने वाली बात है कि गठबंधन टूटने के कुछ ही घंटे बाद लालू जी को गुरु नीतीश की जो कमियां याद आई, दरअसल वह मामल सन 1991 का है। अब आप ही बताएं क्या लालू जी नीतीश को गुरु बनाने से पहले ये बात नहीं जानते थे, या फिर सत्ता के लिए ओ किसी दागी को भी अपना हमसफ़र बनाने में संकोच नहीं कर सकतें है।
खैर बात जो भी आज जिस तरह से गुरु और शिष्य का संवाद चला ओ सुनने लायक था। शिष्य तेजप्रताप अपने गुरु को ये कहतें है कि "आपने कहा क्यों नहीं, मैं इस्तीफ़ा जरूर दे देता, पर आपको तो जाना था। आपने बिहार की जनता के साथ विश्वासघात किया है।"
एकलव्य बनने वाले शिष्य तेजस्वी शायद ये भूल गए थे कि नीतीश और उनके बीच में 45 मिनट तक बंद कमरे में बात हुई थी, उन्होंने नीतीश के इशारे को नहीं समझा हो, पर नीतीश की पीड़ा आज उनके भाषण में साफ़ झलक रही था। अपने एक-एक सवाल का सही समय पर जवाब देने के उद्देश्य के साथ ही, हर बात को सदन के अंदर और सदन के बाहर हमेशा कहूंगा के हौसले हमेशा की तरह आज भी ताज़ा लग रहा था। गुरु नीतीश बिहार की जनता के साथ विश्वशघात पर कहतें है कि "बिहार की जनता ने मुझे चुना सेवा करने के लिए चुना, राजभोग के लिए नहीं। अपने शिष्य और उनके परिवार से छुब्ध नीतीश ने यहां तक कह दिया कि मेरे लिए इनके साथ रहना संभव नहीं था इसलिए हमने ख़ुद को अलग कर लिया। अपने शुरुआत के सफ़र और समता पार्टी के निर्माण की शुरुआत तक कि याद दिलाते हए नीतीश कहतें है कि हम शुरुआत से ही जैसे शिक्षक थे वैसे ही रहेंगे, अपने शिष्य या उसके परिवार के लिए ख़ुद को कभी नहीं बदल सकतें है।
अब देखने वाली बात होगी कि बिहार के इस राजनीति महाभारत में शिष्य अर्जुन परास्त होतें है या गुरु द्रोणाचार्य। क्योंकि दोनों खेमा महाभारत की तरह ही भारी है।
जहां कौरव पक्ष (NDA) में नीतीश कुमार (सेनापति-गुरु द्रोण), नरेंद्र मोदी (भीष्मपितामह), शुशील मोदी (मामा शकुनि), अमित शाह (दुर्योधन) जैसे धुरंधर है तो विपक्ष में बैठे शिष्य अर्जुन (तेजस्वी) के साथ खेल में नहीं होते हुए भी खेल खेलाने वाले श्रीकृष्ण (लालू यादव) एक दूसरे पर भारी है।
हमने अब तक अपने शिष्य से गुरु को नाराज़ होते नहीं देखा था, लेकिन बिहार के विधान सभा में नाराज़ गुरु-शिष्य संवाद को देख कर हैरानी हो रही थी।
आज बिहार विधान सभा में राजद-जदयू-कांग्रेस के महा गठबंधन से अलग होने के बाद, राज्य के पुनः मुख्यमंत्री बनने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बहुमत साबित करने का दिन था। मुख्यमंत्री ने 243 विधायकों में से 131विधायकों के समर्थन से बहुमत सिद्ध किया। जिसके बाद सदन में पिछले 20 महीने से पक्ष में बैठने वालें विधायक आज विपक्ष में बैठे थे। पर नज़ारा देखने वाली ये थी कि आज पक्ष में बैठने वालें गुरु के ठीक विपरीत उनका शिष्य विपक्ष की अगुआई कर रहा था।
मेरे इस गुरु शिष्य के संबंध से आप शायद ये समझ नहीं रहे होंगे कि ये रिश्ता मैंने कैसे तय किया है। इसे समझने के लिए मैं आपको थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।
2015 में बिहार विधान सभा चुनाव में BJP के रथ को रोकने के उद्देश्य से राजद-जदयू-कांग्रेस ने महागठबंधन बना कर चुनाव लड़ा। चुनाव हुई और गठबंधन को बिहार की जनता का भारी समर्थन मिला। इस गठबंधन में राजद 10 वर्षों के बाद बिहार की जनता का बहुत अधिक समर्थन जुटाने में सफ़ल हुई थी। अब मौका था सीट बंटवारे का। इस चुनाव में राजद के दो होनहारों ने पहली बार अपना भाग्य आजमाया और सफल भी हुए। जिनकी मंत्री पद में दावेदारी बहुत ही अहम थी। मंत्री पद बटवारा चर्चा का विषय था, चुकी इस बार राजद सुप्रीमों का चुनाव में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग था, क्योंकि वह कोर्ट के द्वारा चुनाव में शामिल नहीं होने का दंश झेल रहे थे।
मंत्री पद का बटवारा हुआ, तो राजद सुप्रीमों ने अपने अर्जुन (तेजस्वी प्रसाद यादव) को जो क्रिकेट के धुरंधर बनने के लिए खेल की दुनिया में भाग्य आजमा कर वापस आये हुए पुत्र को उपमुख्यमंत्री तो कृष्ण की बांसुरी से प्यार करने वाले बेटे तेजप्रताप को बिहार की जनता के स्वास्थ्य का ख़्याल रखने के लिए स्वास्थ्य मंत्री बना दिया। मीडिया ने जब सवाल करना शुरू किया कि राजनीति का सही से ज्ञान नहीं होने के वावजूद भी लालू ने दोनों बेटों को इतना बड़ा पद दिया तो राजद सुप्रीमों लालू और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ये कहते नहीं थके की "आज नहीं सीखेंगे तो कब सीखेंगे जिम्मेदारी" यहां तक कि एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर अपने साक्षात्कार में राबड़ी देवी ने कहा था कि "मेरे दोनों बेटे अपने चाचा नीतीश से राजनीतिक के गुर सीखेंगे, और बिहार की जनता के लिए बहुत कुछ करेंगे"।
हुआ ऐसा ही, दोनों बेटे चाचा नीतीश से कुल 20 महीने तक राजनीति सीखें।
लेकिन सही कहा जाता है कि गुरु गुड़ ही रहें चेला चीनी हो गया। नीतीश अपने गुरु ज्ञान तो दे ही रहे थे कि चेला ने चीनी बनने का काम किया।
समय ने पलटवार किया और आज ऐसा समय आया कि अब गुरु चेला के साथ निर्वहन करने को तैयार नहीं है।
समय के बदलाव के साथ ही जिस गुरु द्रोणाचार्य के राजनीति शिक्षा के क़ायल लालू-राबड़ी ने अपने ही हाथों, अपने दोनों बेटों को सौप था आज वे ही गुरु की ज्ञान को ग़लत बताने से थक नहीं रहें है। सोचने वाली बात है कि गठबंधन टूटने के कुछ ही घंटे बाद लालू जी को गुरु नीतीश की जो कमियां याद आई, दरअसल वह मामल सन 1991 का है। अब आप ही बताएं क्या लालू जी नीतीश को गुरु बनाने से पहले ये बात नहीं जानते थे, या फिर सत्ता के लिए ओ किसी दागी को भी अपना हमसफ़र बनाने में संकोच नहीं कर सकतें है।
खैर बात जो भी आज जिस तरह से गुरु और शिष्य का संवाद चला ओ सुनने लायक था। शिष्य तेजप्रताप अपने गुरु को ये कहतें है कि "आपने कहा क्यों नहीं, मैं इस्तीफ़ा जरूर दे देता, पर आपको तो जाना था। आपने बिहार की जनता के साथ विश्वासघात किया है।"
एकलव्य बनने वाले शिष्य तेजस्वी शायद ये भूल गए थे कि नीतीश और उनके बीच में 45 मिनट तक बंद कमरे में बात हुई थी, उन्होंने नीतीश के इशारे को नहीं समझा हो, पर नीतीश की पीड़ा आज उनके भाषण में साफ़ झलक रही था। अपने एक-एक सवाल का सही समय पर जवाब देने के उद्देश्य के साथ ही, हर बात को सदन के अंदर और सदन के बाहर हमेशा कहूंगा के हौसले हमेशा की तरह आज भी ताज़ा लग रहा था। गुरु नीतीश बिहार की जनता के साथ विश्वशघात पर कहतें है कि "बिहार की जनता ने मुझे चुना सेवा करने के लिए चुना, राजभोग के लिए नहीं। अपने शिष्य और उनके परिवार से छुब्ध नीतीश ने यहां तक कह दिया कि मेरे लिए इनके साथ रहना संभव नहीं था इसलिए हमने ख़ुद को अलग कर लिया। अपने शुरुआत के सफ़र और समता पार्टी के निर्माण की शुरुआत तक कि याद दिलाते हए नीतीश कहतें है कि हम शुरुआत से ही जैसे शिक्षक थे वैसे ही रहेंगे, अपने शिष्य या उसके परिवार के लिए ख़ुद को कभी नहीं बदल सकतें है।
अब देखने वाली बात होगी कि बिहार के इस राजनीति महाभारत में शिष्य अर्जुन परास्त होतें है या गुरु द्रोणाचार्य। क्योंकि दोनों खेमा महाभारत की तरह ही भारी है।
जहां कौरव पक्ष (NDA) में नीतीश कुमार (सेनापति-गुरु द्रोण), नरेंद्र मोदी (भीष्मपितामह), शुशील मोदी (मामा शकुनि), अमित शाह (दुर्योधन) जैसे धुरंधर है तो विपक्ष में बैठे शिष्य अर्जुन (तेजस्वी) के साथ खेल में नहीं होते हुए भी खेल खेलाने वाले श्रीकृष्ण (लालू यादव) एक दूसरे पर भारी है।

