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Thursday, March 30, 2023

आज भी राम राज्य की कल्पना अधूरी है



9 महीने के गर्व के बाद जब लाल की किलकारी घर में गूंजती है तो परिवार क्या समाज भी उत्साहित हो जाता है। आज के सोशल मीडिया के समय में ऐसे मौकों लोग बस गुनगुनाते हैं

 "हमारा बुझाता बबुआ DM होइए, 3 हिंद_के_सितारा_इ_त_CM_होई_हैं ओसे_उपरा_PM_होई_हैं_हो..." 

लेकिन जब हमारे राम आए थे (पहली बार, अब तो कल्पनाओं में आते हैं।)  तब माहौल था तो कुछ ऐसा ही लेकिन कल्पना DM और PM वाली नहीं थी। अब के माहौल में सोच के अच्छा लगता है की नहीं थी तभी तो अच्छा हुआ। क्योंकि जो प्रभु कर गए वह ना होता और ना शिक्षा देती।

क्योंकि... हमारे राम ऐसे है ही नहीं। हमारे राम तो सबके है। ये दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा सवर्ण और ना जाने क्या-क्या। ये सब के हैं। जो वर्तमान में है वह तो हमने बना दिया है और उम्मीद हम राम राज्य की करते है भला संभव हैं ?

खैर आज (#रामनवमी पर) हमने हर घर में गूंजते हुए सुना... "भय प्रकट कृपाला, दिन दयाला कौशल्या हितकारी..." वैसे मेरे राम हितकारी सबके लिए थे, हैं और आगे भी रहेंगे। ये पक्ष के भी है, विपक्ष के भी है। ये ग्रंथ फाड़ने वाले के भी हैं और लिखने वालों के भी हैं। यह देश राम का है। राम कण कण में हैं।भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र,सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। सबके अपने-अपने राम हैं। तभी तो आज आग उगलने वाले गेरुआ धारी भी राम को अपने रूप में देख रहे हैं, तो संतों की आत्माएं भी इन्हें अपना राम मानती है। सड़क पर भूखा हो या अस्पताल में बीमार सब राम को याद कर रहे हैं और उनके पास राम हमारे मौजूद भी होंगे। गांधी के राम अलग हैं। लोहिया के राम अलग। एक अटल के भी राम थे।वाल्मीकि और तुलसी के राम भी अलग अलग हैं। भवभूति के राम दोनों से अलग हैं। कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना। राम एक हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न।

वैसे तो इस धरती पर देवताओं की कमी नहीं। सबकी अपनी - अपनी लीला है लेकिन राम की सब से अलग है। प्रभु का इंसान बन के समाज को संदेश देने की जो भावना थी उसकी अमित छाप समझने वाले बखूबी समझते हैं तभी तो कभी कृतियों को फाड़ कर विकृति से राजनीति करते हैं, कभी धाम गमन से अमन की उम्मीद। 

              आज पक्ष और विपक्ष में आरोपों - प्रत्यारों का दौर ऐसा हो गया है की भाषा की मर्यादा को लांघ कोई कष्ट में है तो कोई रामराज्य के दावों पर विपक्ष को रौदने की कोशिशों का आरोपी बन रहा है। लेकिन उस राम राज्य का क्या जहां सत्ता विपक्ष के भत्ता पर भी नजर लगाए बैठी हो। इसे तानाशाही कहे तो अफसोस ना होगा। क्योंकि राम ने दुराचारियों को मारा तो मुक्ति का मार्ग दिया। लेकिन आज 'राम' पर राजनीति करने वाले भी मर्यादा को मिट्टी में मिला रहे हैं। और तो और हर घर में राम जैसा पुत्र की कामना करने वाली मां भी कौशल्या जैसी लालसा को बचा कर नहीं रख पाई हैं, ना कोई भाई भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न बनना चाहता है। गुरुओं को तो छोड़ दो, सीता सुकुमारी साबित करने वाली पत्नियों ने तो ऐसा माहौल बनाया है की उन्हें ना बेटों को परिवार से दूर करते वक्त दशरथ की पीड़ा दिखती है ना, समाज की नजरों में बुरी बनी मां कैकई का कष्ट। अब पुत्र लव-कुश भी नहीं रहे जो अपनी मां के हक़ के लिए लड़ सके।

पता है जो बचा है समाज में वो है बस दिखावा।  मन में श्रद्धा नहीं लेकिन दिल में दिखावा भगवान राम के लिए है। बड़े - बड़े डंडे में गेरुआ झंडे लगा "राम राज्य भी आएगा..." जैसे धुन पर प्रभु राम का गुणगान करने वाले कइयों को आज देखा और जानता भी हूं। जिसमें कई अपने पिता, माता, भाई, परिवार और अपनी पत्नी के प्रति भी वफादार नहीं है बावजूद राम राज्य की कामना कर रहा है। 

              अरे सुनो ऐसे राम राज्य नहीं आएगा। मेरे राम को देखो। 'ऐसे हैं मेरे राम' जिसने बाल्यकाल में ही माता को दिव्यदर्शन करा धन्य किया, ऋषियों के रक्षक बने, पीड़ित अहिल्या की व्यथा सुन श्राप मुक्त किया। पिता को खो दिया लेकिन वचन को बनाए रखा। सुख त्याग दिया लेकिन वन साथ ले जाने के लिए अनुमति दे पत्नी की खुशी का भी ख्याल रखा। कई राक्षसों को मारा तो जरूर लेकिन मुक्ति धाम दिया। दोस्ती ऐसी निभाई की दोस्त के लिए कलंकित भी हुए फिर भी उसके साथ खड़े रहे। भाई का साथ ऐसे निभाया की शेषनाग रूपी क्रोधित लक्षण को साथ रखा लेकिन पथ से कभी भटने ना दिया। सेना ऐसी बनाई की सबको अपने मन से काम की आजादी दी, एकछत्र राज नहीं किया। एक राज्य को उसके राजा से दूर किया (रावण को मार के) लेकिन उन्हें अनाथ नहीं छोड़ा। पत्नी से सालों दूर रहे लेकिन समाज का ख्याल रखा और प्यारी पत्नी को आग में झोंक दिया। राजा बने तो दुखी प्रजा को खुशी से भर दिया। भाला मेरे ऐसे राम के चरित्र से कुछ ना सीखे तो सिर्फ रामजन्म, रामनवमी और मंदिर बनाने से कुछ ना होगा। 

फिर सत्ता पर दोषारोपण, विपक्ष की कमजोरी, जाति- धर्म में भेद, और परिवार के प्रति लापरवाही ना कभी खत्म होगी और ना कभी राम राज्य आएगा।


(ये लेखक के अपने विचार है।)