Sunday, March 26, 2023

पत्रकारिता का स्तर गिरा रहे "प्रवक्ता"

 पत्रकारिता का स्तर गिरा रहे "प्रवक्ता"


पत्रकार होने के नाते पत्रकारिता जैसे पेशे पर बोलना और उसमें भी उन लोगों के खिलाफ़ जिनको देख कर या जिन्हें अपना रोल मॉडल भी इंसान मानता हो। लेकिन बीते 24 घंटे में जो देखा उसे बोलने से रोक नहीं पाया। 

            बीते 24 घंटे में राजनीति गलियारे में राहुल गांधी की सदन से सदस्यता ख़त्म होने के बाद ख़ूब उथल-पुथल हुई। तो पार्टी के समर्थकों और विपक्षी नेताओं ने BJP पर आरोप


लगाए। पूरे दिन भर कां कांग्रेस-BJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस चली। आरोप प्रत्यारोप का भी दौर रहा। इन सब का बीच एक उथल - पुथल थी सोशल मीडिया में सम्मानित 'गणमान्यों' (पत्रकार) बीच में। जो पत्रकार नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता बने पत्रकारिता के स्तर को खुद की पैरों की जुत्ती से रौंद रहे थे। जिसका मज़ा आम और ख़ास सब उड़ा रहे थे। ऐसे में अगर हम नवोदित पत्रकारों की गलतियां, कथिक पत्रकारों के करतूत और यूट्यूबरों की खामियों को गिनाएं तो शायद नाइंसाफी होगी। 

             मुद्दा समझिए ! दरअसल राहुल गांधी की सदस्यता ख़त्म होने के बाद अखबारों से लेकर TV मीडिया तक Breaking और कार्यक्रमों की होड़ देखी गई। सब महोदयों ने अपने - अपने स्तर से ख़बर को परोसा क्योंकि सभी महोदायों के अपने दर्शक हैं लेकिन कुछ महोदयों को कुछ की बाते रास नहीं आई और दिव्यदृष्टि रूपी अलौकिक ज्ञान से हमला किया फिर क्या सिलसिला शुरू हुआ और जनता भी मजे लेने लगी। 





स्थिति तो ऐसी थी की कई महोदय गली गलौज तक भी कर रहे थे। 

इन महोदयों के करना कुछ लोग तो बड़े - बड़े सवाल भी करने लगे थे। ये हिम्मत आज आपसी फजीहत के कारण है।

                   सवाल ये है की सबको अभिव्यक्ति की आजादी है। ये आजादी सबके पास है आम हो या ख़ास। उसी में कुछ महोदय अपने संस्थान और अपनी निजी विचारों के मुताबिक भी ख़बर परोसते हैं। जिनमें कोई सरकार का पक्षधर है तो किसी को   केंद्र की वर्तमान सरकार के 8 साल के कार्यकाल में आजतक कुछ दिखा ही नहीं सिवा कमियों के बावजूद दूसरों की सोच पर ताना दे रहे हैं। ये सत्य है की भारतीय पत्रकारिता का शुरुआती दौर की पत्रकारिता का वक्त नहीं है और ना ही अख़बार/समाचार की वह क्रांति जिसने आजादी के लिए जल रही अग्नि में घी का काम किया। बल्कि ये औद्योगिक युग है इसकी पत्रकारिता फ़ायदे और लालच की आंच पर पाक रही है। हां ये आंच सबके अलग - अलग है। कोई कांग्रेस की आंच पर रोटी सेंक रहा, कोई BJP की चूल्हे पर दाल गला रहा। कोई ऐसा भी है जो चूल्हा अपना बता रहा लेकिन उसकी आग किसी और के चूल्हे की है फिर भी वह इसकी रोटी - उसकी रोटी करने में तुला हुआ है। समझ ये नहीं आता की क्या ये तू तू मैं मैं करने के उनकी पत्रकारिता चमक रही है या उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है की उनके ही द्वारा तैयार किए गए पत्रकारिता के बेहतर स्तर में अब बट्टा लग रहा है। जहां एक तरफ ऐसे सम्मानित लोगों के बीच आरोप प्रत्यारोप और दूसरी तरफ कथित पत्रकार और समाचार यूट्यूब चैनल पर अनसुलझे पत्रकारों के काम के कारण स्थिति ऐसी हो गई है की कभी पेशे में पत्रकारिता बताने पर नाम मात्र की काफ़ी था पहचान के लिए आज स्थिति वह नहीं रह गई है। अब पत्रकार ही पार्टियों के प्रवक्त बन बैठे हैं और प्रवक्त संबंधित चैनलों के लिए बहस का सुरक्षित ठिकाना। पत्रकार जो सरकार की कमियों और उपलाधियों को जनता तक पहुंचाए और जनता की समस्या सरकार तक पहुंचाए वाला फॉर्मूला सिर्फ किताब के पन्नों तक ही सिमटकर रह गया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो ना ही जानता सुख से रह पाएगी और ना ही लोकतंत्र की सही परिभाषा का व्याखान होगा। मेरा तो कहना है जो जैसे रहा उसे रहने दें अब

"हे देश के नए कर्णधारों, अथक पथ पर तुम पधारो,

नई युग की नई किरण से, लोक तंत्र को तुम सवारों।।"

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