Thursday, July 7, 2022

सिर्फ सुर्खियों पर सक्रियता क्यों ?

एक सवाल बा रउआ सब से...

देश में जब कोई मुद्दा सुर्खियों में होता है, तब ना जाने क्यों लोगों की आंख खुल जाती है। जैसे आज हिंदू धर्म ख़तरे में दिख रहा हो या यूं कहें कि देवी-देवताओं का अपमान हो रहा हो।

              आज फ़िल्म मेकर लीना मनिमेकलई की डाक्यूमेंट्री फ़िल्म #काली के पोस्टर पर बवाल चल रहा है तो #हिन्दूवादी लोगों की भावना #भगवान के प्रति जाग गई है। लेकिन आज चिल्लाने वाले लोगों को ये जान लेना चाहिए कि #अभिव्यक्ति_की_आज़ादी के नाम पर कई बार #ईश्वरों का अपमान हुआ है लेकिन पहले भी जगी हुई ये क्रांति की ज्वाला स्वतः ही शांत हो जाती है।
              निर्देशक #अनुराग_बसु की फ़िल्म #लूडो (याद नहीं होगा), निर्देशक #राजकुमार_हिरानी की चर्चित फिल्म #पीके, #अक्षय_कुमार की फ़िल्म #लक्ष्मी_बॉम #राजश्री_देशपांडे की फ़िल्म #सेक्सी_दुर्गा (बाद में नाम बदला) #सैफअली_खान की चर्चित वेब सीरिज़ #तांडव, वेव सीरिज़ #ए_सूटेबल_बॉय जैसे कई फ़िल्म सीरिज़ में देवी-देवताओं और धर्म का अपमान हुआ। लेकिन Social Media क्रांति के बाद कुछ नहीं हुआ। जिसका नतिज़ा है कि आगे #अमिता_बच्चन की फ़िल्म #ब्रह्मास्त्र भी आने वाली है।
#आगे_सुने...
कुछ दिन पहले #चित्रकार #मकबूल_फ़िदा_हुसैन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दू देवी देवताओं की नग्न तस्वीरें बनाकर अपनी लोकप्रियता में चार चाँद लगाया था। हाल में MX_Player पर फेमस शो LUCK_UPP में विजेता बने #मुन्नवर_फारूखी अर्स से फर्श पर चला गया।
#ऑस्ट्रेलिया के #सिडनी में हुए एक फैशन शो में #लिसा_ब्लू नामक #फैशन_डिज़ाईनर द्वारा खुल कर हिन्दू देवी-देवताओं के अपमान का मामला सामने आया। इस फैशन शो में डिजाइनर लीजा ब्लू ने जो कलेक्शन पेश किया उसमें हिंदू देवी-देवताओं के चित्रों को अश्लील तरीके से इस्तेमाल किया गया। कई बार जूते चप्पलों पर हिन्दू देवी देवताओं की तस्वीरें देखने को मिली है। लेकिन कभी किसी का खून नहीं खौला और आज जब राजनीतिक पार्टियां रोटी सेक रही है तो हम भी फुरसत में हैं।

हँसी तो तब आती है जब हिन्दू बहुसंख्यक देश भारत में हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाली #BJP सरकार में हैं लेकिन नपुंसक सरकार ने इस मामले में रूचि तो ज़रूर लिया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समाज में इस कुकृत्य के लिए कोई विरोध दर्ज कराना भी उचित नहीं समझा। ना ही आगे ऐसे कुकृत्य को रोकने के लिए कोई कानून का ही ज़िक्र है। जो न्याय दिख रहा है वह चिल्लाते TV चैनलों पर और Social Media के लिए मोबाइल के Keybord की बटन पर दौड़ती उंगलियों पर ही दिख रही है।

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