सिद्धार्थ को बिहार के गया में ज्ञान की प्राप्ति हुई, बन गए महात्मा बुद्ध। पूर्वी एशिया का अधिकांश देश बुद्धमय हो गया। श्रीलंका से चीन और जापान तक उसका प्रकाश फैला, बिहारी के काम न आया।
बिहार से ही जैन के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर ने दुनिया को पंचशील का सिद्धांत बताया-अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) ,ब्रह्मचर्य। बन गए भगवान महावीर। बिहार इससे अछूता रह गया।
जिस बिहार के पाटलिपुत्र(पटना) को चन्द्रगुप्त और सम्राट अशोक ने राजधानी बनाकर उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण मैसूर तक तथा पूर्व में आज के म्यांमार, बांग्लादेश तक और पश्चिम में अफ़गानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक शासन कर लोहा मनवाया, आज वह पाटलिपुत्र की धरती अपने पर क्यों रो रही है?
सिख पंथ के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का आविर्भाव भी इसी बिहार में हुआ, पंजाब के साथ देश-विदेश में उनके ज्ञान का प्रकाश फैला, लेकिन बिहार का अंधेरा दूर नहीं हो पाया।
मोहनदास करमचंद गांधी ने बिहार के चम्पारण से सत्याग्रह का आंदोलन चलाया, सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ाया, देश के आजादी की नींव रखी, अंग्रेजों की सत्ता हिल गई, देश को आजादी मिल भी गई, बन गए महात्मा। बिहार जस का तस अपनी जगह खड़ा रहा, गांधी का सत्य और अहिंसा का पाठ भी बिहार के काम न आया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल के खिलाफ बिहार से बिगुल फूंक संपूर्ण क्रांति का आगाज कर देश और प्रदेश की सरकारें बदल दी, लेकिन उस क्रांति से उपजे नेता, पिछले बत्तीस वर्षों से राज कर रहे हैं, बिहार को क्या मिला, यक्ष प्रश्न है?
और तो और बिहार के पद्मश्री बिंदेश्वर पाठक ने पूरे देश को सुलभ शौचालय का कॉन्सेप्ट दिया। साफ-सफाई में यह मील का पत्थर साबित हुआ, लेकिन इस कॉन्सेप्ट का बिहार के शहरों की सफाई में योगदान पर भी प्रश्न चिन्ह है। इतना ही नहीं देश का शायद ही कोई राज्य हो, जहां बिहारी आई.ए.एस., आई.पी.एस.कानून व्यवस्था को सुधारने में अपना लोहा न मनवा रहा हो, लेकिन बिहार की कानून व्यवस्था, प्रश्न के दायरे में ही है? कहा जाता है कि बिहारियों में न तो होम सिकनेस होता है और न ही किसी काम को करने में उसे कोई हिचक होती है, फिर भी रोजी-रोटी के लाले पड़े हैं और दूसरे राज्यों के भरोसे जीविका की तलाश की जाती रही है। बिहार में न मानव संसाधन की कमी है, न उपजाऊ मिट्टी या पानी की। कमी कहां रह गई? यह सोचने की बात है। दूसरे राज्यों में बिल्डिंगें बिहारी बनवा रहा है, साफ-सफाई का ध्यान बिहारी रख रहा है, खेतों में काम कर उनके गोदामों को अनाज से बिहारी भर रहा है, अधिकांश राज्यों का शासन-प्रशासन भी बिहारी देख रहा है, तो बिहार पिछड़ा क्यों रह गया? आखिर बिहार को किसकी नजर लग गई। हम बिहारियों ने दुनिया को राह दिखाया, अपने लिए राह न बना पाये। पढ़ा था 'दीपक तले अंधेरा' नाम का एक मुहावरा भी होता है। हम बिहारियों ने तो इसे सिद्ध करके दिखा दिया। पता नहीं अब किस आका के आसरे बिहार और बिहारियों का भाग्य टिका है? क्योंकि पिछले पचहत्तर वर्षों में हमने कई एक्सपेरिमेंट किये, नतीजा ढाक के तीन पात। अब तो पचहत्तर वर्षों में समय-समय पर जनता द्वारा नकारी गईं सरकारें ही साथ-साथ हैं। फिर भी उम्मीद की आस शेष है?
✍️S.P.SINGH
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