तेरे आरोप में हम जिए जा रहे हैं
उफ नहीं करता, दर्द-ओ-घूंट पिये जा रहे हैं
सच है कि ना हम जल्लाद हैं, ना विष की पोटली
फिर भी आप हम पर सितम-पर-सितम किए जा रहे हैं।
मेरी हालातों को ना जाना, ना खुद को समझाया है
दूरी बनाने के बहाने ही सही, आरोप तो लगाया है
चलो उस आरोप को भी स्वीकार करते हैं
तुम ख़ुद की ज़िंदगी जिओ...
हम रोज अपने आपको तबाह करते हैं।
उस समय को आपने भुलाया है
लेकिन बढ़ते कदम में पग आपने भी बढ़ाया है
हम तो ख़ुद को रोकते रहे, परिस्थितियों को सोचते रहें...
सवाल था...
पता नहीं कभी मिल पाएंगे, या खुद से बिछड़ जाएंगे
सोचा कहीं ये मेरी ये एक और ग़लती हो जाएगी,
जो समय-समय पर मुझे वक्त-वे-वक्त तड़पायेगी
आज हालात बिल्कुल निराले हैं,
तुम छोड़ चली और हम तेरे प्यार में मतवाले हैं।
तुम रोज मेरी गलतियों को गिनवाती हो,
कभी उस आरोपों पर ध्यान लगती हो
तेरे ज़िंदगी में आने से आबो हवा बदल गई
कल तक जो थी बेसुध ज़िंदगी अब तेरी हो गई
ख़ैर... तुम्हें प्यार में दर्द क्या सताएगा
तुम्हें तो पता था...
जो तेरा पहले था आज फिर हो जाएगा
इसलिए अपने फैसले से ना तुम डर पाई
चार कदम आगे बढ़ाया और मुझे कर दी पराई...

ReplyDeleteबहुत ही सुंदर रचना, कलम चलती रहे