Friday, June 28, 2019

आर्टिकल 15

मेरे तरफ से- 4/5*
व्यवसायिक दृष्टि से- 2.5/5*

'आर्टिकल 15' में एक संवाद है 'हमारे यहां काम करने वालों की औकात वही होती है, जो हम तय करते हैं, सबकी कोई ना कोई औकात होती ही है' फ़िल्म का ये संवाद ही पूरी फिल्म की दशा और दिशा बता देती है।
वैसे भी फ़िल्म के नाम में ही निर्देशक अनुभव सिन्हा ने पूरी कहानी बता दी है कि आखिर फ़िल्म में होगा क्या ? खैर...
#कहानी- फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी है कि अपर पुलिस अधीक्षक अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) का तबादला यूपी के एक ऐसे गवाई क्षेत्र में होता है, जहां की दलित समाज (SC/ST वाले) के लोगों पर वहां के बड़े जाति के लोगों द्वारा शोषण किया जाता है... और तो और वहां जो पुलिस-प्रशासन के जो लोग हैं वह बड़े जाति (SC/ST को छोड़ कर) के ही लोगों का समर्थन करते हैं, क्योंकि उन्हें इसबात का डर है कि वह समर्थन नहीं करेंगे तो उन्हें जान से हाथ धोना पड़ेगा। लेकिन इन सब के बीच यूरोप में एक लंबा समय बिता चुके अयान रंजन ASP बन कर यहां पहुँचता। जहां रास्ते में ही उन्हें पासी (डोम) जाति जैसे छुआछूत वाले लोग के बारे में जानकारी मिलती है, जिससे ओ अनजान होते हैं और ये सारी बात ओ अपने दोस्त अदिति (ईशा तलवार) को बताते हैं क्योंकि ओ अच्छी लेखक है सो उनके काम आए। इसी दौरान उस गांव में एक घटना घटती है... जहां एक ठीकेदार से अपने मज़दूरी के एवज मेहताना में 3 रुपये अधिक बढ़ा कर देने की मांग करती है, जिसके चलते ठीकेदार 3 लड़कियों को उठा कर पहले गैंग रेप करता फिर 2 लड़कियों को पेड़ से लटका देता जबकि 1 लड़की भागने में सफ़ल हो जाती है। मामले की जानकारी होते ही ASP मयंक तीसरी लड़की की तलाश शुरू करते है और पूरी फिल्म की कहानी बस इसी के इर्द-गिर्द घूमती है। वही इस मामले को खुलता देख एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी (मनोज पहवा) इस मामले को खत्म करने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन सफ़ल नहीं हो पाता है। हालांकि फिल्म में थोड़ा मोड़ आता है जब CBI के हाथ में मामला जाता है, कहानी के दौरान कुछ ईमानदार कुछ करप्ट अधिकारी को भी फिल्माया गया है, साथ ही कुछ ज्वलंत मुद्दे जैसे- गौ हत्या पर सड़क पर बांध कर मारपीट, दलित नेताओं के घर बैठकर खाना खाना, भगवाधारी चुनावी रैली करना इत्यादि। पूर्ण रूप से कहानी कुछ बड़ी नहीं है समाजिक मुद्दा नहीं होता तो फ़िल्म की कहानी में दम नहीं है।

#संगीत- पूरी फ़िल्म संगीत से नदारद है, हां Director ने फ़िल्म में गवई भाव देने की पूरी कोशिश की है जो अच्छा लगा है, वही कई जगह म्यूजिक बहुत परेशान करती है, फ़िल्म की शुरूआत में आदिवासी लड़की (सयानी गुप्ता ) द्वारा गाया गया गाना... "हम कहेम त लाग जाई धक से" जो गाना पूरी तरह से सिनेमा स्कोप पर गांव के रंग को निखारता है, और फ़िल्म की दास्तान को पहले ही दृश्य में साफ कर देता है।

#फ़िल्म में खूबी- निर्देशक अनुभव सिन्हा यूपी के रहने वाले है, और खुद उन्होंने कहानी लिखा है तो जमीनी पकड़ भी बेहतर है, इसे फिल्माने के लिए उन्होंने गांव चुना जो फ़िल्म के अनुसार ठीक है... फ़िल्म में सिनेमेटोग्राफी काफी बढ़िया है... फ़िल्म में इस्तेमाल किये गए कुछ दृश्य बहुत ही ह्रदयविदारक है और फ़िल्म की कहानी में जान डाल देते है। फ़िल्म में जितने भी कलाकार हैं अव्वल दर्जे के है तो अभिनय भी जाहिर सी बात है बेहतर होगी। संवाद बढ़िया है, ख़ास कर गेस्ट अपीयरेंस में जीशान आयूब के अपने छोटे से रोले में अच्छी संवाद (इंसान जो कभी हरिजन बन जाते हैं, कभी बहुजन बन जाते हैं मगर जन नहीं बन पाते हैं)  के कारण छाप छोड़ जाते हैं। फ़िल्म में निर्देशक अनुभव सिन्हा ने काफी छोटी-2 बातों का ख़्याल रखा है, जैसे- पुलिस अधिकारी द्वारा कुत्ते तो बिस्कुट खिलाना पर इंसान के रूप में पिछड़ी जाति के लोग प्रिये नहीं है, समझने वाली ऐसी बहुत सी बातें हैं। एडिटिंग बढ़िया है।

#फ़िल्म में कमी- फ़िल्म में कमजोर कहानी को पंख देने के लिए स्क्रीन प्ले काफी बढ़िया नहीं है... फ़िल्म निर्देशक की कमी दिखी है, पूरी फिल्म को रात और सुबह (भोर यानी 4 बजे) के वक्त ही फिल्माया गया है, ऐसा लगता है कि यूपी पुलिस दिन में काम नहीं करती है। फ़िल्म में संगीत नहीं है, रोमांस नहीं है। एक्शन नहीं है। सयानी अभिनय और मेकप से पिछड़ी लगी हैं पर संवाद से थोड़ा पिछड़ी है, हालांकि 9वीं तक पढ़ने की बात हुई है फिर भी। फ़िल्म में इंटरवल नहीं है, हालांकि अगर आप थियेटर में जाते हैं तो आपको इंटरवल मिलेगा, परेशान न हो। इसके साथ ही एक बात और है कि फ़िल्म निर्देशक ने 1-2 नहीं कई बार जाति और अंतर का अनुभव कराया है फिर भी उन्हें आर्टिकल 15 क्या है बताने की ज़रूरत पड़ी । फ़िल्म ड्रामा के साथ थ्रीलर भी था पर झलक नहीं मिला है ज्यादा।
#कुल मिलाकर देखे तो- मनोरंजन के भाव से देखें तो फ़िल्म नहीं है, परंतु जानकारी और अभिनय के प्रिय हैं तो फ़िल्म आपके लिए बेहतर है। कांसेप्ट बढ़िया है, सभी कलाकारों ने बेहतर काम किया है।
#कौन देखे- फिल्मों की अच्छी समझ हो, सामाजिक परिवेश को जानना चाहते हो, पत्रकारिता क्षेत्र से है, समाजिक संस्था से जुड़े है, दलित/सामान्य वर्ग के हैं तो अवश्य देखे,
#कौन बिल्कुल न देखे- पार्टी पोलटिक्स वाले, मनोरंजन के लिए फ़िल्म देखने वाले, टाइम पास करने वाले, और महिला मित्र के जानेवाले...

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