Sunday, July 23, 2017

मैच हारा, दिल जीत कर !

हरे-हरे घास भरे मैदान पर लड़की के हाथ से छूटी लाल गेंद का विकेट तोड़ना,
तो कहीं दौड़ लगती लड़की के लम्बे बाल का खुलने से संवारने तक का नज़ारा...
अगर कहीं मोहीत करता है, तो ओ है सबसे बड़े रोमांचक खेल क्रिकेट की महिला ब्रिगेडियर के साथ।
         अगर ये नज़ारा आज साक्षी बना है तो इसके पीछे भारत की उन बेटियों का लगन और परिश्रम जुड़ा है जिन्होंने अपना सब कुछ इस क्रिकेट को समर्पित कर दिया है।
            आज लॉर्ड्स (लंदन) के ऐतिहासिक मैदान में भारत की इस बेटियों को पसीना बहाते देख सीना चौड़ा हो रहा था।
             हमारे देश में भले ही सबको बराबर का अधिकार प्राप्त है लेकिन फिर भी हर जगह पुरुष प्रधानता की बू जरूर आ जाती है, और उसका ही कारण था कि आजतक हम भारतीय (कुछ ख़ास को छोड़ कर) क्रिकेट में सिर्फ लड़को को ही जानते थे।
पिछले कुछ समय में तो ये भी सवाल सुन लिया कि #लड़कियां_भी_क्रिकेट_खेलतीं_है ?
और ये सच भी है।
              महिला क्रिकेट टीम के इतिहास पर थोड़ा गौर करें तो देखा जाता है कि भारत में महिला क्रिकेट की शुरुआत 1973 से माना जाता है, जब महिला क्रिकेट संघ की स्थापना हुई,(वैसे भारत में क्रिकेट 16वी शताब्दी में ही आ गया था, और पहला मैच पुरुषों के द्वारा 1721 में खेला गया था।) हालांकि भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने सन 1976 में पहला मैच "वेस्टइंडीज" के खिलाफ़ खेला था। धीरे-धीरे सफ़र तय करता हुआ महिला विंग 2006 में इतना काबिल बन चुका था कि भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) ने उसे अपने में समाहित करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। इस तरह 2006 में महिला क्रिकेट संघ के BCCI में विलय के बाद इनकी नाव कुछ तेज हुई। भारत की इन झाँसीयों की लगन और कठिन परिश्रम का परिणाम ही है की कम मेहनताना और सही सम्मान नहीं मिलने के वावजूद भी अपनी काबिलियत के बदौलत लोहा मनवाया और आज यह बहुतों के दिलों पर राज कर रहीं है।
           भारत की झाँसीयों ने आज 2017 विश्व कप के फाइनल मुकाबले में जीत के लक्ष्य के साथ ही इतिहास को बदलने उत्तरी थी। हालांकि अफ़सोस जनक हार का इन्हें सामना करना पड़ा। आज भारत की टीम जीत जाती तो ये भारतीय महिला क्रिकेट टीम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा जाता। क्योंकि आजतक भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने विश्वकप नहीं जीता है, इस से पूर्व महिला टीम ने सन 2005 में विश्व कप के फाइनल में पहुँची थी जहां उन्हें ऑस्ट्रेलिया के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।
         ख़ैर खेल,खेल होता है और इसे खेल की भावना से ही देखना चाहिए। लेकिन आज मुझे गर्व इस बात का हो रहा है था कि आज के इस मैच पर बहुत से लोगों का नज़र बना हुआ था। इससे भी बड़ी बात ये है कि उन बहुत से नज़र में कुछ ऐसे भी नज़र थे जो दिन में एक ही TV कार्यक्रम दिन में 4 बार दे तो 4 बार देखने वाले भी शामिल थे। मुझे ख़ुशी इस बात की नहीं है कि ये नज़र शामिल हुए, बल्कि खुशी इस बात कि है, कि बदलते भारत के नज़र ने कुछ और नया देखा। संभवतः इस ख़ास नज़र के नज़रियों में कोई ऐसा भी होगा जो एक दिन उस हरी-भरी घास को रौंदता नज़र आए।
             आज के इस शानदार और रोमांचक मुकाबलेे को देख कर मुझे ऐसा नहीं लगा कि कही भी कोई ऐसी ख़ास तरह की कमियां रहीं हो जो प्रधान पुरुषों के मुकाबले इन झाँसीयों में अधिक हो। लड़ाई और रोमांच इनमें भी कूट कर भरा हुआ था।
        इस मैच को देखने के बाद अब आगे भी इनसे लोगों की उम्मीद और बढ़ गई होगी। और ऐसा होना भी चाहिए। बड़ी ख़ुशी होती है जब आपकी मेहनत के मुताबिक मेहनताना मिले।
इन खिलाड़ियों को भी उम्मीद होती है, और देखा जाए तो इस वर्ष इन खिलाड़ियों ने बहुत सराहना भी बटोरा है अब देखने वाली बात है कि इनके साथ आगे कितना न्याय होता है। अब तो बहुत अफ़सोस होगा जब अखबारों की शुर्खियाँ बन कर ये लड़कियां अपनी मेहनताना की दरकार करेंगी तो।
             सरकार से उम्मीद करूँगा कि इस झाँसीयों को भी उम्मीदतन सहायता उपलब्ध कराया जाय और प्रसारण संबधी मामलों पर विचार-विमर्श कर हर भारत वासियों तक इनकी पहुँच सुनिश्चित कर पुरुष-महिला भेद-भाव को ख़त्म किया जाय।
 क्योंकि आज इस बेटियों न फ़िल्म दंगल कि संवाद को सच कर दिखाया है कि...
म्हारी_बेटियां_भी_छोरो_से_कम_है_के

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